बड़ी लोकसभा: लोकतंत्र की मजबूती या नई चुनौतियों की शुरुआत?
भारत में एक बार फिर परिसीमन और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने को लेकर बहस तेज हो गई है। चर्चा इस बात पर है कि 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा की सीटों को बढ़ाया जाए ताकि 2029 के चुनाव से 33% महिला आरक्षण लागू किया जा सके। सरकार का दावा है कि किसी मौजूदा सांसद की सीट कम किए बिना हर राज्य को लगभग 50% अतिरिक्त सीटें दी जाएंगी।यानी लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व भी बढ़ेगा और महिला आरक्षण भी लागू हो जाएगा। लेकिन इसके साथ कई सवाल भी उठ रहे हैं—क्या इतनी बड़ी लोकसभा देश के लिए फायदेमंद होगी? क्या इससे उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक तनाव बढ़ेगा? और सबसे बड़ा सवाल, क्या लोकतंत्र मजबूत होगा या कमजोर?बड़ी लोकसभा के फायदे
. “एक व्यक्ति, एक वोट” का सिद्धांत मजबूत होगाअभी भारत में एक लोकसभा सांसद औसतन लगभग 22.93 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। यह संख्या दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों की तुलना में बहुत ज्यादा है। अगर लोकसभा सीटें बढ़कर करीब 850 हो जाती हैं, तो यह औसत घटकर लगभग 14.5 लाख रह जाएगा।इसका सीधा फायदा यह होगा कि सांसद अपने क्षेत्र के लोगों से ज्यादा जुड़ सकेंगे। स्थानीय समस्याओं पर अधिक ध्यान दिया जा सकेगा और जनता तक पहुंच आसान होगी। महिला आरक्षण लागू करने में आसानी2023 में संसद ने महिला आरक्षण कानून को मंजूरी दी थी। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने पर मौजूदा सांसदों की सीटें प्रभावित होतीं।अब सरकार का फार्मूला यह है कि कुल सीटें बढ़ा दी जाएं ताकि पुरुष सांसदों की मौजूदा सीटें बनी रहें और महिलाओं को नई सीटों में प्रतिनिधित्व मिले। इससे राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और विरोध भी कम होगा।
उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे राज्यों का तर्क है कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व आबादी के हिसाब से होना चाहिए।अगर परिसीमन लागू होता है तो उत्तर प्रदेश का लोकसभा में हिस्सा लगभग 14.73% से बढ़कर 16% से अधिक हो सकता है। इससे जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक प्रतिनिधित्व मजबूत होगा। दक्षिणी राज्यों को भी अतिरिक्त सीटेंसरकार यह स्पष्ट कर रही है कि किसी राज्य की सीटें घटाई नहीं जाएंगी। उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर लगभग 58-59 हो सकती हैं, जबकि केरल की 20 सीटें बढ़कर करीब 30 हो सकती हैं।यानी सरकार संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है ताकि दक्षिणी राज्यों को नुकसान महसूस न हो।बेहतर प्रशासन और विकासछोटे निर्वाचन क्षेत्रों में सांसद ज्यादा सक्रिय रह सकते हैं। सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा। इससे विकास योजनाओं की निगरानी और जनता की समस्याओं का समाधान बेहतर तरीके से संभव होगा।
. भारी आर्थिक बोझपहले से ही संसद की एक दिन की कार्यवाही पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। अगर सांसदों की संख्या 850 तक पहुंचती है, तो यह खर्च और बढ़ जाएगा।सिर्फ संसद के संचालन पर सालाना हजारों करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च होने का अनुमान है। इसके अलावा राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटें बढ़ेंगी, जिससे सरकारी खर्च और बढ़ेगा। उत्तर-दक्षिण विवाद गहरा सकता हैदक्षिण भारत के कई राज्यों का कहना है कि उन्होंने परिवार नियोजन को सफल बनाया, जनसंख्या नियंत्रित रखी, लेकिन अब उन्हें कम राजनीतिक प्रभाव मिलेगा।अगर परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर हुआ तो उत्तर भारत के राज्यों का प्रभाव बढ़ सकता है और दक्षिणी राज्यों का प्रतिशत घट सकता है। यही वजह है कि तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में चिंता बढ़ रही है। संसद का कामकाज कठिन हो सकता है850 सदस्यों वाली लोकसभा को संभालना आसान नहीं होगा। बहस लंबी चलेगी, शोर-शराबा बढ़ सकता है और निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है।पहले से ही संसद में हंगामे और बाधाओं की शिकायत रहती है, ऐसे में बड़ा सदन और चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
. राजनीतिक हेरफेर का खतरापरिसीमन के दौरान निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय की जाती हैं। विपक्ष को डर है कि इसमें राजनीतिक लाभ के लिए बदलाव किए जा सकते हैं।इसे “गैरिमैंडरिंग” कहा जाता है, जिसमें सीमाएं इस तरह बनाई जाती हैं कि किसी खास दल को फायदा पहुंचे। संघीय ढांचे पर असरभारत एक संघीय लोकतंत्र है जहां राज्यों और केंद्र के बीच संतुलन जरूरी है। दक्षिणी राज्यों के नेताओं का कहना है कि यदि उत्तर भारत का राजनीतिक प्रभाव बहुत ज्यादा बढ़ा, तो संघीय संतुलन कमजोर पड़ सकता है।क्या 50% बढ़ोतरी वाला फॉर्मूला समाधान है?गृह मंत्री Amit Shah और संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju ने आश्वासन दिया है कि हर राज्य को लगभग 50% अतिरिक्त सीटें मिलेंगी।लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह आश्वासन अभी राजनीतिक बयान तक सीमित है, क्योंकि विधेयक के मसौदे में इसे स्पष्ट रूप से नहीं लिखा गया है। इसलिए विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है।आम आदमी के लिए इसका क्या मतलब?यदि सही तरीके से लागू किया गया तो बड़ी लोकसभा भारत के लोकतंत्र को अधिक प्रतिनिधित्व देने वाली व्यवस्था बना सकती है।
महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, सांसद जनता के करीब होंगे और लोकतांत्रिक संतुलन मजबूत होगा।लेकिन यदि परिसीमन राजनीतिक लाभ का साधन बन गया या क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ा, तो यह उत्तर-दक्षिण तनाव और संघीय विवाद को भी जन्म दे सकता है।इसलिए आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण बात यही होगी कि सरकार और विपक्ष मिलकर ऐसा मॉडल तैयार करें जो लोकतंत्र को मजबूत करे, न कि विभाजन को बढ़ाए। 2029 का चुनाव केवल महिला आरक्षण का चुनाव नहीं होगा, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक संरचना की नई दिशा भी तय करेगा।
लेखक विजय शर्मा
