महिला आरक्षण और परिसीमन: भारतीय लोकतंत्र की नई दिशा

भारतीय राजनीति में इन दिनों महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर गहन बहस छिड़ी हुई है। संसद में इस विषय पर चर्चा की अनुमति मिलने के बाद राजनीतिक दल अपने-अपने तर्कों और दृष्टिकोण के साथ सामने आ गए हैं। यह बहस केवल एक विधेयक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक ढांचे, सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुकी है।इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि वर्ष 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून से जुड़ी हुई है। उस समय इसे भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया था। हालांकि, इसके लागू होने की प्रक्रिया जनगणना और परिसीमन जैसी संवैधानिक प्रक्रियाओं से जुड़ी होने के कारण आगे खिसकती दिखाई दे रही थी। अब सरकार संशोधन के माध्यम से इन प्रक्रियाओं को सरल बनाकर वर्ष 2029 के आम चुनावों तक इसे प्रभावी रूप से लागू करना चाहती है।

नए प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करने की योजना बनाई गई है। इसके साथ ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव रखा गया है। यदि यह लागू होता है तो करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित हो जाएंगी। यह केवल सीटों की संख्या में वृद्धि नहीं होगी, बल्कि भारतीय संसद की संरचना और प्रतिनिधित्व के स्वरूप में बड़ा परिवर्तन माना जाएगा।सरकार का कहना है कि यह संशोधन सामाजिक समानता और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। सरकार का तर्क है कि संविधान में संशोधन करना संसद का अधिकार है और समय-समय पर देश की जरूरतों के अनुसार बदलाव किए जाते रहे हैं। इसी सोच के तहत यह भी प्रस्तावित किया गया है कि परिसीमन की प्रक्रिया नई जनगणना की प्रतीक्षा किए बिना 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर की जाए, ताकि कानून के क्रियान्वयन में अनावश्यक देरी न हो।वहीं विपक्ष इस प्रस्ताव को लेकर कई गंभीर सवाल उठा रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि वे महिला आरक्षण के विरोध में नहीं हैं, लेकिन सीटों की संख्या बढ़ाने और परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर उनकी आपत्तियां हैं। उनका आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन को प्रभावित किया जा सकता है। कई नेताओं का मानना है कि इससे संघीय ढांचे पर असर पड़ेगा और कुछ राज्यों को अधिक राजनीतिक शक्ति मिल सकती है।

राजनीतिक बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण की मांग को लेकर भी सामने आया है। समाजवादी पार्टी के नेता Akhilesh Yadav ने यह सवाल उठाया कि यदि महिलाओं को आरक्षण दिया जा रहा है, तो उसमें सभी वर्गों और समुदायों की महिलाओं को समान अवसर मिलना चाहिए। इसके जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान की मूल भावना के खिलाफ माना जाएगा। इस मुद्दे पर संसद और राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस देखने को मिली।इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र “परिसीमन” बन गया है। परिसीमन का अर्थ है चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का पुनर्निर्धारण, ताकि जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व संतुलित रहे। अभी तक लोकसभा सीटों का निर्धारण मुख्य रूप से 1971 की जनगणना के आधार पर किया जाता रहा है। लेकिन अब प्रस्ताव है कि संसद को यह अधिकार मिले कि वह तय करे कि किस जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन किया जाए।विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव का असर विभिन्न राज्यों पर अलग-अलग तरीके से पड़ सकता है। अनुमान है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को सीटों में बढ़ोतरी का लाभ मिलेगा। वहीं दक्षिण भारत के कुछ राज्यों, विशेषकर Tamil Nadu, को सीटों के अनुपात में कमी का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि दक्षिण भारत के कई नेता इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं और इसे क्षेत्रीय असंतुलन की दिशा में उठाया गया कदम बता रहे हैं।

यदि वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो संसद में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है। लोकसभा में महिलाओं की संख्या कुल सदस्यों का लगभग 14 प्रतिशत ही है। राज्यसभा में भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। वैश्विक स्तर पर तुलना करें तो कई छोटे और विकासशील देश भी महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत से आगे हैं। ऐसे में महिला आरक्षण कानून भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी और संतुलित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।हालांकि, इस कानून के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। आरक्षित सीटों का रोटेशन प्रत्येक चुनाव में होगा, जिससे नेताओं को अपने निर्वाचन क्षेत्र बदलने पड़ सकते हैं। राजनीतिक दलों को भी बड़ी संख्या में महिला उम्मीदवार तैयार करनी होंगी। केवल कानून बना देने से बदलाव संभव नहीं होगा, बल्कि राजनीतिक सोच और कार्यशैली में भी परिवर्तन आवश्यक होगा।चूंकि यह संविधान संशोधन से जुड़ा मामला है, इसलिए इसे पारित करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होगी। संसद में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन के बिना यह संभव नहीं है। सरकार के पास बहुमत जरूर है, लेकिन दो-तिहाई समर्थन सुनिश्चित करने के लिए उसे अन्य दलों का सहयोग लेना पड़ सकता है। इसी कारण राजनीतिक सहमति और बैक चैनल बातचीत इस पूरी प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाएगी।महिला आरक्षण का मुद्दा कोई नया विषय नहीं है। पिछले तीन दशकों से यह भारतीय राजनीति में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। वर्ष 2010 में इसे राज्यसभा से मंजूरी मिली थी, लेकिन लोकसभा में यह पारित नहीं हो पाया। अंततः वर्ष 2023 में इसे कानून का रूप मिला और अब सरकार इसे शीघ्र लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

स्पष्ट है कि महिला आरक्षण केवल एक कानूनी व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी है। इससे महिलाओं को राजनीति में अधिक अवसर मिलेंगे और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ेगी। हालांकि, इससे जुड़े विवाद और राजनीतिक चुनौतियां भी कम नहीं हैं।अंततः यह कहा जा सकता है कि महिला आरक्षण और परिसीमन का यह प्रस्ताव भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी परीक्षा है। यह तय करेगा कि देश सामाजिक न्याय, समानता और समावेशी राजनीति के सिद्धांतों को किस हद तक व्यवहार में उतारने के लिए तैयार है। यदि यह प्रक्रिया सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति का स्वरूप बदल सकता है और महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में यह ऐतिहासिक कदम सिद्ध हो सकता है।

लेखक कांतिलाल मांडोत