“कॉकरोच खत्म नहीं होते”
बेरोजगारी, व्यवस्था और युवाओं के अपमान की कहानी
भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में गिना जाता है। हर साल लाखों छात्र कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से डिग्री लेकर निकलते हैं। कोई इंजीनियर बनता है, कोई पत्रकार, कोई वकील, तो कोई प्रशासनिक सेवा का सपना लेकर वर्षों तक तैयारी करता है। लेकिन जब इन्हीं युवाओं को नौकरी नहीं मिलती, अवसर नहीं मिलते और व्यवस्था उन्हें बार-बार निराश करती है, तब उनके भीतर गुस्सा पैदा होना स्वाभाविक है।इसी बीच देश के सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की एक टिप्पणी ने पूरे देश में नई बहस छेड़ दी। उन्होंने कहा कि कुछ बेरोजगार युवा “कॉकरोच” जैसे होते हैं, जिन्हें कहीं काम नहीं मिलता और वे बाद में एक्टिविस्ट या सोशल मीडिया पर हमलावर बन जाते हैं। यह बयान केवल एक टिप्पणी नहीं रहा, बल्कि करोड़ों बेरोजगार युवाओं के आत्मसम्मान पर चोट की तरह महसूस किया गया।आखिर बेरोजगारों की तुलना कॉकरोच से क्यों? क्या देश का युवा केवल इसलिए अपमान सहने के लिए मजबूर है क्योंकि उसके पास नौकरी नहीं है? यह सवाल अब केवल राजनीति का नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था की संवेदनशीलता का भी है।
कॉकरोच एक ऐसा जीव माना जाता है जिसे लोग गंदगी, अंधेरे और अवांछित वातावरण से जोड़ते हैं। वर्षों से यह मिथक भी फैलाया गया कि यदि दुनिया में न्यूक्लियर युद्ध हो जाए, तब भी कॉकरोच जीवित रहेंगे। 1965 में अमेरिका में प्रकाशित एक विज्ञापन ने इस सोच को और लोकप्रिय बनाया था, जिसमें कहा गया कि तीसरे विश्व युद्ध का असली विजेता इंसान नहीं, बल्कि कॉकरोच होगा। बाद में हिरोशिमा और नागासाकी की घटनाओं के बाद भी यह धारणा बनी रही कि कॉकरोच अत्यधिक तबाही के बाद भी जीवित रह सकते हैं।लेकिन इस जीव का प्रतीकात्मक इस्तेमाल जब बेरोजगार युवाओं के लिए किया गया, तब समस्या पैदा हुई। क्योंकि बेरोजगारी कोई अपराध नहीं है। यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत विफलता से ज्यादा व्यवस्था की असफलता होती है।भारत में बेरोजगारी की स्थिति बेहद गंभीर है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आंकड़ों के अनुसार करोड़ों युवा रोजगार की तलाश में हैं। गाँवों से लेकर महानगरों तक पढ़े-लिखे युवक नौकरी की कतार में खड़े दिखाई देते हैं। कोई रेलवे परीक्षा की तैयारी कर रहा है, कोई SSC, कोई UPSC, तो कोई प्राइवेट कंपनियों के चक्कर काट रहा है। कई युवा ओवरक्वालिफाइड होने के बावजूद मामूली वेतन पर काम करने को मजबूर हैं।समस्या यह है कि आज का युवा केवल नौकरी नहीं खोज रहा, बल्कि सम्मानजनक जीवन की तलाश कर रहा है। वह चाहता है कि उसकी पढ़ाई, मेहनत और संघर्ष का मूल्य हो। लेकिन जब उसे लगातार असफलता मिलती है, भर्ती परीक्षाएं रद्द होती हैं, पेपर लीक होते हैं और नौकरियां घटती जाती हैं, तब निराशा बढ़ती है।
ऐसे समय में यदि देश की सबसे बड़ी न्यायिक संस्था से जुड़े व्यक्ति बेरोजगारों के लिए “कॉकरोच” जैसा शब्द इस्तेमाल करें, तो यह केवल आलोचना नहीं, बल्कि मानसिक आघात बन जाता है। क्योंकि न्यायपालिका को समाज में संवेदनशीलता और संतुलन का प्रतीक माना जाता है।यही कारण है कि इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। कई युवाओं ने कहा कि अगर व्यवस्था रोजगार नहीं दे पा रही, तो उसका गुस्सा बेरोजगारों पर क्यों निकाला जा रहा है? कुछ लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अप्रत्यक्ष हमला भी बताया।इसी विवाद के बीच “कॉकरोच जनता पार्टी” नाम का एक व्यंग्यात्मक डिजिटल आंदोलन सामने आया। इसे अभिजीत दीपके नाम के युवा ने शुरू किया। यह कोई वास्तविक राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया पर युवाओं की नाराजगी और व्यंग्य का प्रतीक बन गया। हजारों युवाओं ने खुद को “कॉकरोच” कहकर पोस्ट करना शुरू कर दिया। यह आंदोलन दिखाता है कि आज का युवा अपमान को चुपचाप सहने वाला नहीं है। वह व्यंग्य के जरिए ही सही, अपनी बात रखने की कोशिश कर रहा है।दरअसल, इतिहास गवाह है कि जब भी समाज में युवाओं को अवसर नहीं मिले, तब असंतोष बढ़ा है। बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं होती, यह मानसिक और सामाजिक संकट भी बन जाती है। लंबे समय तक नौकरी न मिलने से आत्मविश्वास टूटता है। परिवार और समाज का दबाव अलग होता है। कई युवा अवसाद तक में चले जाते हैं। ऐसे में उन्हें प्रेरणा और सहानुभूति की जरूरत होती है, तिरस्कार की नहीं।आज सोशल मीडिया पर सक्रिय कई युवा एक्टिविज्म कर रहे हैं, RTI लगा रहे हैं, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं या वैकल्पिक मीडिया प्लेटफॉर्म बना रहे हैं। यह लोकतंत्र का हिस्सा है। हर असहमति को “हमला” मान लेना भी ठीक नहीं है। लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है।
यह भी सच है कि सोशल मीडिया ने कई बार अफवाहों और अराजकता को बढ़ावा दिया है, लेकिन उसी सोशल मीडिया ने बेरोजगारी, पेपर लीक, भ्रष्टाचार और अन्याय जैसे मुद्दों को भी सामने लाने का काम किया है। यदि युवा अपनी समस्याएं व्यक्त कर रहे हैं, तो उन्हें “कॉकरोच” कहकर खारिज करना समाधान नहीं हो सकता।भारत का युवा देश की सबसे बड़ी ताकत है। वही देश का भविष्य बनाता है, वही अर्थव्यवस्था को गति देता है और वही लोकतंत्र को जीवित रखता है। लेकिन यदि वही युवा खुद को अपमानित महसूस करने लगे, तो यह किसी भी राष्ट्र के लिए चिंता की बात है।आज जरूरत इस बात की है कि बेरोजगारी पर गंभीर चर्चा हो। सरकारें रोजगार निर्माण पर ध्यान दें, शिक्षा व्यवस्था को व्यावहारिक बनाया जाए, भर्ती प्रक्रियाओं को पारदर्शी किया जाए और युवाओं को सम्मान दिया जाए। क्योंकि सम्मान हर इंसान की सबसे बड़ी जरूरत होती है।कॉकरोच शायद वैज्ञानिक मिथकों में जीवित रहने वाला प्राणी हो सकता है, लेकिन भारत का युवा कोई कॉकरोच नहीं है। वह सपनों, संघर्षों और उम्मीदों से भरा इंसान है। वह देश की ऊर्जा है। उसे अपमानित करके नहीं, बल्कि अवसर देकर आगे बढ़ाया जा सकता है।आखिर में सवाल यही है —यदि करोड़ों युवा बेरोजगार हैं, तो समस्या युवाओं में है या व्यवस्था में?और यदि युवा सवाल पूछ रहे हैं, तो क्या उन्हें कॉकरोच कहना उचित है?
लेखक राजेश पाण्डेय , प्रयागराज उप्र
