उत्तर प्रदेश में योगी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती: भ्रष्टाचार
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है। यहां की राजनीति केवल प्रदेश तक सीमित नहीं रहती, बल्कि दिल्ली की सत्ता तक उसका सीधा प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री केवल एक प्रदेश का नेता नहीं माना जाता, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा चेहरा बन जाता है। आज अगर उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे चर्चित नाम किसी का है, तो वह है योगी आदित्यनाथ। योगी आदित्यनाथ को कठोर प्रशासन, कानून व्यवस्था और हिंदुत्व की राजनीति के लिए जाना जाता है। लेकिन यदि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा, तो उसका सबसे बड़ा कारण केवल और केवल भ्रष्टाचार होगा।प्रदेश के गांव से लेकर राजधानी लखनऊ तक भ्रष्टाचार का ऐसा जाल फैल चुका है कि आम आदमी खुद को पूरी तरह असहाय महसूस करने लगा है। सरकारी दफ्तरों में बिना पैसे के कोई काम होना अब लोगों को असंभव लगने लगा है। चाहे तहसील हो, थाना हो, ब्लॉक हो या कोई अन्य सरकारी कार्यालय — हर जगह आम जनता को एक ही समस्या का सामना करना पड़ रहा है, और वह है रिश्वतखोरी।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सरकार को यह सब दिखाई नहीं देता? क्या मुख्यमंत्री को यह जानकारी नहीं है कि नीचे से लेकर ऊपर तक पूरा सिस्टम भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है? सच्चाई यह है कि मुख्यमंत्री सब जानते हैं। उन्हें यह भी पता है कि प्रदेश की जनता किस तरह परेशान है। लेकिन राजनीतिक व्यवस्था की विडंबना यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई करना कई बार सत्ता के लिए खतरा बन जाता है।उत्तर प्रदेश में आज अधिकारियों और कर्मचारियों का एक ऐसा नेटवर्क बन चुका है जो जनता की समस्याओं का समाधान करने के बजाय उनसे पैसा कमाने का माध्यम ढूंढता है। यही कारण है कि सरकार की सबसे चर्चित योजनाओं में से एक “जनसुनवाई पोर्टल” भी आम आदमी के लिए मजाक बनकर रह गया है।प्रधानमंत्री के निर्देश पर मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल बनाया गया था। इसका उद्देश्य था कि प्रदेश का कोई भी नागरिक अपनी शिकायत सीधे सरकार तक पहुंचा सके और उसे न्याय मिल सके। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि लाखों शिकायतों का निस्तारण किया जा चुका है। कागजों में यह योजना पूरी तरह सफल दिखाई देती है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयान करती है।
आज स्थिति यह है कि अगर कोई व्यक्ति एसडीएम से शिकायत करता है, तो मामला जनसुनवाई पोर्टल पर डाल दिया जाता है। अगर डीएम से शिकायत की जाती है, तब भी वही प्रक्रिया अपनाई जाती है। शिकायत अंततः उसी अधिकारी के पास भेज दी जाती है जिसके खिलाफ शिकायत होती है। अब सोचिए, जिस अधिकारी पर आरोप लगा है, वही अपनी जांच रिपोर्ट तैयार करेगा तो क्या निष्पक्ष न्याय संभव है?सबसे दुखद बात यह है कि ऊपर बैठे अधिकारी भी नीचे से आई रिपोर्ट को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय हो, डीएम कार्यालय हो या एसडीएम कार्यालय — अधिकतर मामलों में नीचे से जो रिपोर्ट आती है, उसी को आधार बनाकर शिकायत का निस्तारण कर दिया जाता है। आम आदमी की बात कहीं सुनी ही नहीं जाती।यहीं से भ्रष्टाचार का असली खेल शुरू होता है। जो अधिकारी रिपोर्ट तैयार करता है, उसका उद्देश्य न्याय देना नहीं होता, बल्कि किसी तरह मामले को दबाना होता है। अगर प्रतिवादी पक्ष से पैसा मिल गया, तो रिपोर्ट उसी के पक्ष में लिख दी जाती है। शिकायतकर्ता कितना भी सही क्यों न हो, उसकी बात को झूठा साबित करने की कोशिश की जाती है।
ऐसे हजारों मामले हैं जहां गरीब आदमी अपनी जमीन, अपने अधिकार या किसी सरकारी सुविधा के लिए महीनों तक दफ्तरों के चक्कर लगाता रहता है। वह वकीलों पर पैसा खर्च करता है, अधिकारियों के यहां जाता है, आवेदन लिखवाता है, लेकिन अंत में उसके हाथ में केवल निराशा आती है। रिपोर्ट में लिख दिया जाता है कि शिकायत निराधार है, या फिर कहा जाता है कि मामला नियमों के अनुसार सही पाया गया।जनता का सबसे बड़ा दर्द यही है कि उसे न्याय नहीं मिलता। सरकार चाहे कितने भी पोर्टल बना दे, कितनी भी योजनाएं चला दे, जब तक व्यवस्था के अंदर बैठे भ्रष्ट लोग सुधरेंगे नहीं, तब तक कोई भी व्यवस्था सफल नहीं हो सकती।आज उत्तर प्रदेश में एक आम नागरिक यह मानने लगा है कि बिना रिश्वत दिए उसका कोई काम नहीं होगा।
यह मानसिकता लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जब जनता का भरोसा व्यवस्था से उठने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समस्या केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक भी बन चुकी है।योगी आदित्यनाथ की छवि एक ईमानदार और सख्त मुख्यमंत्री की रही है। जनता आज भी मानती है कि मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से भ्रष्ट नहीं हैं। लेकिन सवाल यह है कि अगर नीचे पूरा सिस्टम भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है, तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी? जनता अंततः सरकार को ही जिम्मेदार मानेगी।राजनीति में केवल भाषण और प्रचार से चुनाव नहीं जीते जाते। जनता कुछ समय तक नारों और भावनाओं से प्रभावित हो सकती है, लेकिन जब उसके रोजमर्रा के जीवन में समस्याएं बढ़ने लगती हैं, तब उसका गुस्सा वोट में बदल जाता है। उत्तर प्रदेश की जनता आज भी कानून व्यवस्था को लेकर योगी सरकार की तारीफ करती है, लेकिन भ्रष्टाचार का मुद्दा लगातार सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है।अगर समय रहते सरकार ने इस समस्या पर कठोर निर्णय नहीं लिया, तो आने वाले चुनावों में यह मुद्दा सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा बन सकता है।
भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई, जनसुनवाई पोर्टल की निष्पक्ष जांच व्यवस्था और शिकायतों के पारदर्शी निस्तारण जैसी व्यवस्थाएं लागू करनी होंगी। वरना जनता यह मानने लगेगी कि पूरी व्यवस्था केवल दिखावा है।उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में सत्ता को बनाए रखना आसान नहीं होता। यहां जनता हर बदलाव को बहुत गहराई से महसूस करती है। यदि सरकार वास्तव में जनता का विश्वास बनाए रखना चाहती है, तो उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ वैसी ही सख्ती दिखानी होगी जैसी अपराधियों के खिलाफ दिखाई गई थी।क्योंकि अंततः किसी भी सरकार की सबसे बड़ी ताकत जनता का भरोसा होता है। और जब यही भरोसा टूटने लगता है, तब सबसे मजबूत राजनीतिक किले भी ढह जाते हैं।
