राष्ट्रभक्ति, समर्पण और त्याग की जीवंत प्रतिमा: बालासाहब देवरस जी
बालासाहब देवरस का जीवन केवल एक संगठन प्रमुख का जीवन नहीं था, बल्कि वह राष्ट्रसेवा, त्याग और समर्पण की ऐसी प्रेरक गाथा था जिसने लाखों स्वयंसेवकों के जीवन को दिशा दी। उनका व्यक्तित्व जितना सरल था, उतना ही गहरा और प्रभावशाली भी। वे उन विरले व्यक्तित्वों में से थे जिन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित कर दिया।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक के रूप में बालासाहब देवरस जी ने संगठन को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनका विश्वास केवल विचारों तक सीमित नहीं था, बल्कि वे स्वयं अपने जीवन से उन विचारों को जीते थे। यही कारण है कि स्वयंसेवकों के मन में उनके प्रति केवल सम्मान ही नहीं, बल्कि एक पुत्रवत स्नेह और श्रद्धा भी थी।
उनके जीवन का एक अत्यंत भावुक प्रसंग आज भी स्वयंसेवकों की आँखें नम कर देता है। यह घटना उस समय की है जब वे अत्यधिक अस्वस्थ चल रहे थे। शरीर ने उनका साथ देना लगभग छोड़ दिया था। वे व्हीलचेयर पर रहते थे और बोलने में भी उन्हें अत्यधिक कठिनाई होती थी। सामान्य व्यक्ति ऐसी अवस्था में अपने स्वास्थ्य, अपने दुख और अपनी पीड़ा के बारे में सोचता है, लेकिन बालासाहब जी का मन तब भी राष्ट्र और स्वयंसेवकों में ही लगा हुआ था।एक दिन कुछ युवा स्वयंसेवक उनसे मिलने पहुँचे। वे सभी मन ही मन चिंतित थे। उन्होंने सोचा कि बालासाहब जी की तबीयत इतनी खराब है कि उन्हें अधिक देर तक परेशान करना उचित नहीं होगा। इसलिए वे केवल प्रणाम करके शांतिपूर्वक लौट जाना चाहते थे।
कमरे में एक गहरा मौन था। वातावरण भावुकता से भरा हुआ था। सभी स्वयंसेवकों की निगाहें उस महान व्यक्तित्व पर टिकी थीं जिसने अपना पूरा जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया था। जैसे ही वे पास पहुँचे, बालासाहब जी ने बड़ी कठिनाई से अपनी आँखें खोलीं और धीमे स्वर में पूछा—“शाखा ठीक चल रही है न?”उनकी यह बात सुनकर सभी स्वयंसेवक भावुक हो उठे। जिस व्यक्ति का शरीर असहनीय पीड़ा से गुजर रहा हो, जो स्वयं चल-फिर भी न पा रहा हो, वह अपने बारे में नहीं, बल्कि शाखा और संगठन के बारे में सोच रहा था। यही उनके जीवन का सार था।स्वयंसेवकों ने उत्तर दिया—“हाँ, सब ठीक है।”यह सुनकर उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। फिर उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा—“मेरे लिए चिंता मत करना… बस शाखा कभी बंद मत होने देना।”इन शब्दों ने वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति के हृदय को भीतर तक झकझोर दिया। कमरे में सन्नाटा छा गया। ऐसा लगा मानो समय कुछ क्षणों के लिए थम गया हो। यह केवल एक वाक्य नहीं था, बल्कि एक तपस्वी का अंतिम संदेश था। उनके लिए शाखा केवल दैनिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि राष्ट्र निर्माण का माध्यम थी। वे जानते थे कि शाखा के माध्यम से ही ऐसे चरित्रवान, अनुशासित और राष्ट्रभक्त युवाओं का निर्माण होगा जो भारत के उज्ज्वल भविष्य की नींव बनेंगे।वहाँ उपस्थित एक सेवक की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने भावुक होकर कहा—“आप अपने स्वास्थ्य की चिंता कीजिए।”
यह सुनकर बालासाहब जी मुस्कुराए। उनकी मुस्कान में त्याग, तपस्या और आत्मबल की अद्भुत चमक थी। फिर उन्होंने जो कहा, वह हर स्वयंसेवक के लिए जीवनभर की प्रेरणा बन गया—“मेरा स्वास्थ्य अब राष्ट्र के काम नहीं आएगा, लेकिन तुम्हारा जीवन आएगा… उसे राष्ट्र को दे देना।”यह सुनते ही वहाँ उपस्थित अनेक स्वयंसेवकों की आँखें नम हो गईं। उस क्षण सबको ऐसा अनुभव हुआ मानो कोई संगठन प्रमुख नहीं, बल्कि एक पिता अपने पुत्रों को जीवन का अंतिम उपदेश दे रहा हो। उनके शब्दों में केवल प्रेरणा नहीं थी, बल्कि एक गहरा आत्मीय भाव भी था।
बालासाहब देवरस जी का पूरा जीवन इसी भावना से ओतप्रोत था—“स्वयं को पीछे रखकर राष्ट्र को सबसे आगे रखना।” उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं चाहा। उनका जीवन सादगी, अनुशासन और राष्ट्रसेवा का आदर्श उदाहरण था। वे मानते थे कि व्यक्ति से बड़ा राष्ट्र होता है और राष्ट्र से बड़ा कोई स्वार्थ नहीं।उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक कार्य किया। उन्होंने सामाजिक समरसता, सेवा और संगठन विस्तार पर विशेष बल दिया। वे केवल विचारक नहीं थे, बल्कि कर्मयोगी थे। समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा पहुँचाना उनके जीवन का ध्येय था।
बालासाहब जी का यह प्रसंग हमें यह भी सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वही होता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने उद्देश्य से विचलित न हो। आज के समय में जब लोग छोटी-छोटी कठिनाइयों में निराश हो जाते हैं, तब बालासाहब जी का जीवन हमें धैर्य, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का संदेश देता है।उनका व्यक्तित्व हमें यह प्रेरणा देता है कि राष्ट्र निर्माण केवल भाषणों से नहीं होता, बल्कि त्याग, अनुशासन और निरंतर कर्म से होता है। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि जब कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्र के लिए जीता है, तब उसका जीवन अमर हो जाता है।आज भी लाखों स्वयंसेवकों के लिए बालासाहब देवरस जी प्रेरणा के स्रोत हैं। उनका जीवन हर उस व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक है जो समाज और राष्ट्र के लिए कुछ करना चाहता है। उनकी वाणी, उनका त्याग और उनका समर्पण सदैव याद किया जाएगा।
वास्तव में, बालासाहब देवरस जी केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि राष्ट्रभक्ति की एक जीवंत चेतना थे। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची महानता पद या प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि निस्वार्थ सेवा और समर्पण में होती है। यही कारण है कि उनका स्मरण आज भी करोड़ों लोगों के हृदय में श्रद्धा और प्रेरणा का संचार करता है।
लेखक गिरीश भारद्वाज
