11 दिन में 7 मुलाकातें: नरोत्तम मिश्रा से क्यों मिल रहे BJP के बड़े नेता?
11 दिन में 7 मुलाकातें, नरोत्तम मिश्रा से क्यों मिल रहे BJP के बड़े नेता?
मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों एक ऐसा सवाल तेजी से चर्चा में है, जिसका जवाब अभी बीजेपी ने सार्वजनिक तौर पर नहीं दिया है। सवाल है कि आखिर नरोत्तम मिश्रा से पार्टी के बड़े नेता लगातार क्यों मिल रहे हैं?
खास बात यह है कि इस समय नरोत्तम मिश्रा न तो विधायक हैं, न सरकार में मंत्री और न ही उनके पास कोई प्रमुख संवैधानिक पद है। इसके बावजूद संगठन और सरकार से जुड़े कई बड़े चेहरे उनसे मुलाकात कर चुके हैं।
11 दिनों में सात बड़े नेताओं की मुलाकात
नरोत्तम मिश्रा से मुलाकातों का सिलसिला 1 सितंबर से शुरू हुआ। अगले 11 दिनों में बीजेपी के अलग-अलग स्तर के नेताओं की लगातार मौजूदगी ने राजनीतिक चर्चाओं को तेज कर दिया।
क्षेत्रीय महामंत्री अजय जामवाल ने नरोत्तम मिश्रा से मुलाकात की।
वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय नरोत्तम मिश्रा से मिले।
कैबिनेट मंत्री विजय शाह ने मुलाकात की।
नरोत्तम मिश्रा ने दिल्ली में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात की।
विधायक लखन पटेल ने नरोत्तम मिश्रा से मुलाकात की।
मध्य प्रदेश के डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा ने मुलाकात की।
बीजेपी प्रदेश प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह ने नरोत्तम मिश्रा से मुलाकात की।
11 दिनों की तस्वीर
- कुल सात महत्वपूर्ण राजनीतिक मुलाकातें
- संगठन और सरकार दोनों स्तर के नेताओं की मौजूदगी
- राष्ट्रीय नेतृत्व से भी संपर्क
- नरोत्तम मिश्रा की अगली भूमिका को लेकर बढ़ती चर्चा
नरोत्तम मिश्रा ने मुलाकातों को बताया सामान्य
लगातार हो रही मुलाकातों के बीच नरोत्तम मिश्रा ने इसे किसी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के तौर पर पेश नहीं किया। उन्होंने बीजेपी नेताओं के साथ अपने पुराने और दोस्ताना रिश्तों का हवाला दिया।
नरोत्तम मिश्रा लंबे समय तक विधायक रहे हैं और कई बार मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। ऐसे में पार्टी नेताओं के साथ उनके संपर्क को वह स्वाभाविक बताते हैं।
पार्टी में मेरी भूमिका कप्तान तय करेगा। जहां जिम्मेदारी मिलेगी, वहां काम करूंगा।
क्रिकेट के उदाहरण के जरिए दिया गया यह संदेश राजनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे संकेत मिलता है कि नरोत्तम मिश्रा फिलहाल पार्टी नेतृत्व के निर्णय को स्वीकार करने और संगठन द्वारा दी जाने वाली किसी भी जिम्मेदारी को निभाने के लिए तैयार हैं।
चुनावी हार के बाद भी खत्म नहीं हुई राजनीतिक उपयोगिता
2023 के विधानसभा चुनाव में दतिया सीट से हार के बाद नरोत्तम मिश्रा की सक्रिय राजनीति को लेकर सवाल जरूर उठे थे। लंबे समय तक मध्य प्रदेश सरकार में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले नेता की चुनावी हार को बड़ा राजनीतिक झटका माना गया।
लेकिन इसके बावजूद बीजेपी ने संगठन में उनके अनुभव का इस्तेमाल किया। लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें पार्टी की न्यू जॉइनिंग टोली का प्रदेश संयोजक बनाया गया था।
नरोत्तम मिश्रा के अनुसार, उनके नेतृत्व में बड़ी संख्या में लोगों ने बीजेपी की सदस्यता ली। इनमें कांग्रेस से जुड़े लोगों की संख्या भी उल्लेखनीय रही। यह उनकी संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक संपर्कों को दिखाता है।
इसके बाद राज्यसभा और बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर भी उनका नाम चर्चा में आया, लेकिन पार्टी ने इन जिम्मेदारियों के लिए अन्य नेताओं को चुना।
दतिया उपचुनाव ने बढ़ाए थे सवाल
2026 के दतिया उपचुनाव में बीजेपी ने नरोत्तम मिश्रा को उम्मीदवार नहीं बनाया। पार्टी ने आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा, लेकिन चुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा।
इसके बाद नरोत्तम मिश्रा की भविष्य की राजनीतिक भूमिका को लेकर चर्चा और तेज हुई। अब पार्टी के बड़े नेताओं की उनसे लगातार मुलाकातें इस पूरे घटनाक्रम को एक नया राजनीतिक कोण दे रही हैं।
क्या 2027 के यूपी चुनाव से भी जुड़ा है मामला?
नरोत्तम मिश्रा की हालिया सक्रियता को कुछ राजनीतिक जानकार 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से भी जोड़कर देख रहे हैं। यूपी देश का सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य है और यहां सामाजिक तथा जातीय समीकरण चुनावी रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
बीजेपी के वरिष्ठ ब्राह्मण नेताओं की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चा रहती है। ऐसे में नरोत्तम मिश्रा जैसे अनुभवी नेता की संभावित संगठनात्मक या चुनावी भूमिका पर नजर जाना स्वाभाविक है।
हालांकि, अभी यह केवल राजनीतिक विश्लेषण और अटकलों का विषय है। बीजेपी ने नरोत्तम मिश्रा को यूपी चुनाव से जोड़कर कोई आधिकारिक जिम्मेदारी घोषित नहीं की है।
शक्ति प्रदर्शन या संगठन की तैयारी?
नरोत्तम मिश्रा से लगातार मुलाकातों को सीधे बीजेपी के भीतर किसी शक्ति संघर्ष का संकेत मानना फिलहाल जल्दबाजी होगी। पार्टी में बड़े राजनीतिक फैसले अक्सर केंद्रीय और संगठनात्मक नेतृत्व के स्तर पर तय होते हैं।
इसलिए इन मुलाकातों का एक संभावित अर्थ यह भी हो सकता है कि बीजेपी आगामी चुनावों और संगठनात्मक रणनीति के लिए वरिष्ठ नेताओं से विचार-विमर्श कर रही है।
दूसरी संभावना यह है कि पार्टी नेतृत्व नरोत्तम मिश्रा के अनुभव और राजनीतिक संपर्कों को किसी नई जिम्मेदारी में इस्तेमाल करने पर विचार कर रहा हो। लेकिन जब तक पार्टी की ओर से आधिकारिक घोषणा नहीं होती, इसे केवल संभावना के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल अब क्या?
नरोत्तम मिश्रा फिलहाल किसी प्रमुख पद पर नहीं हैं, लेकिन बीजेपी के बड़े नेताओं के साथ उनकी लगातार मुलाकातें बताती हैं कि उनका राजनीतिक अध्याय पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। क्या उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी, क्या वह किसी दूसरे राज्य में चुनावी भूमिका निभाएंगे या फिर पार्टी उन्हें किसी रणनीतिक काम में इस्तेमाल करेगी—इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सामने आ सकते हैं।
11 दिनों में सात महत्वपूर्ण मुलाकातें निश्चित तौर पर मध्य प्रदेश की राजनीति में चर्चा का विषय हैं। हालांकि, इन मुलाकातों को किसी नियुक्ति या बड़े राजनीतिक बदलाव का पक्का संकेत कहना अभी सही नहीं होगा।
इतना जरूर है कि चुनावी हार और पद से दूरी के बावजूद नरोत्तम मिश्रा बीजेपी के राजनीतिक परिदृश्य से गायब नहीं हुए हैं। उनका अनुभव, संगठनात्मक संपर्क और लंबे राजनीतिक सफर को देखते हुए पार्टी भविष्य में उन्हें किस तरह इस्तेमाल करती है, यह देखना दिलचस्प होगा।
फिलहाल बीजेपी की ओर से कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए सबसे ज्यादा नजर अब नरोत्तम मिश्रा की अगली राजनीतिक गतिविधियों और पार्टी नेतृत्व के साथ होने वाली आगामी मुलाकातों पर है।
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