फिर रिटायर होते ही मुकेश अंबानी के पास पहुँच गए।

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रिटायरमेंट के बाद कॉरपोरेट बोर्ड: सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं, व्यवस्था और जवाबदेही का है
विशेष रिपोर्ट • कॉरपोरेट गवर्नेंस

रिटायरमेंट के बाद कॉरपोरेट बोर्ड में बड़े सरकारी नाम: सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं, व्यवस्था और जवाबदेही का भी है

जब सार्वजनिक संस्थानों में शीर्ष जिम्मेदारियां निभा चुके अधिकारी निजी कंपनियों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं संभालते हैं, तो पारदर्शिता, हितों के टकराव और ‘कूलिंग-ऑफ’ व्यवस्था पर बहस क्यों जरूरी हो जाती है?

भारत में बड़े सरकारी पदों से सेवानिवृत्ति के बाद निजी क्षेत्र में नियुक्तियां कोई नई बात नहीं हैं। लेकिन जब नियुक्ति उसी क्षेत्र के बड़े कारोबारी समूह में हो, जिसकी गतिविधियां कभी सार्वजनिक नीति, नियमन, टैक्स, बैंकिंग या ऊर्जा जैसे क्षेत्रों से जुड़ी रही हों, तब सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या मौजूदा नियम पर्याप्त हैं और क्या जनता को पर्याप्त जानकारी मिलती है?

हाल के वर्षों में कुछ ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जिनमें पूर्व वरिष्ठ सरकारी अधिकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के शीर्ष अधिकारी बाद में रिलायंस समूह या उससे जुड़ी कंपनियों के बोर्ड अथवा नेतृत्व भूमिकाओं में दिखाई दिए। इन नियुक्तियों को कंपनियां आम तौर पर उनके अनुभव, विशेषज्ञता और कॉरपोरेट गवर्नेंस में योगदान के संदर्भ में देखती हैं। दूसरी तरफ, आलोचक पूछते हैं कि सार्वजनिक पद और निजी कॉरपोरेट जिम्मेदारी के बीच पर्याप्त दूरी और पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाए।

कुछ प्रमुख नियुक्तियां

1

अरुंधती भट्टाचार्य

भारतीय स्टेट बैंक की पूर्व चेयरपर्सन अरुंधती भट्टाचार्य 2018 में Reliance Industries Limited के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशक के रूप में शामिल हुईं। RIL के आधिकारिक प्रोफाइल में उनकी नियुक्ति और स्वतंत्र निदेशक की भूमिका दर्ज है।

2

के. वी. चौधरी

पूर्व CBDT चेयरमैन और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त K. V. Chowdary जून 2019 में CVC पद से सेवानिवृत्त हुए। RIL के रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें अक्टूबर 2019 में कंपनी के बोर्ड में नियुक्त किया गया। मीडिया रिपोर्टों ने इसे उनकी सेवानिवृत्ति के लगभग चार महीने बाद की नियुक्ति बताया था।

3

संजीव सिंह

Indian Oil Corporation के पूर्व चेयरमैन संजीव सिंह 30 जून 2020 को IOC से सेवानिवृत्त हुए। अगस्त 2020 में रिपोर्ट किया गया कि वे Reliance Industries के Oil-to-Chemicals कारोबार में Group President की भूमिका संभालेंगे।

4

राजीव मेहरिशी

भारत के पूर्व Comptroller and Auditor General Rajiv Mehrishi को जुलाई 2023 में Jio Financial Services के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशक नियुक्त किया गया। Jio Financial की वर्तमान बोर्ड सूची में भी उनका नाम Independent Director के रूप में दर्ज है।

5

एम. के. जैन

पूर्व RBI Deputy Governor M. K. Jain के मार्च 2025 में Reliance Industries में सलाहकार के रूप में शामिल होने की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। रिपोर्टों के अनुसार वे वित्तीय सेवाओं से जुड़े रणनीतिक मामलों में समूह को सलाह देने वाले थे।

क्या यह सिर्फ अनुभव का इस्तेमाल है?

इन नियुक्तियों को लेकर दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते हैं। पहला दृष्टिकोण यह है कि दशकों तक बैंकिंग, वित्त, टैक्स, ऑडिट, ऊर्जा और प्रशासन में काम कर चुके अधिकारियों के पास अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषज्ञता होती है। निजी कंपनियों के लिए ऐसी विशेषज्ञता कॉरपोरेट गवर्नेंस, जोखिम प्रबंधन और रणनीतिक निर्णयों में उपयोगी हो सकती है।

दूसरा दृष्टिकोण हितों के संभावित टकराव पर केंद्रित है। यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक पद पर रहते हुए किसी ऐसे क्षेत्र को नियंत्रित या निगरानी करता रहा हो जिसमें कोई निजी कंपनी सक्रिय है, तो सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद उसी कंपनी से जुड़ने पर जनता यह जानना चाह सकती है कि नियुक्ति से पहले कौन-से नियम लागू हुए, क्या कोई कूलिंग-ऑफ अवधि थी और संभावित हितों के टकराव का आकलन कैसे किया गया।

तथ्य और आरोप अलग-अलग रखना जरूरी है

किसी पूर्व सरकारी अधिकारी का किसी निजी कंपनी के बोर्ड में शामिल होना अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि उसने सरकारी पद पर रहते हुए उस कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाया। इसी तरह किसी कंपनी के खिलाफ किसी विवाद या सरकारी कार्रवाई का होना अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि बाद में उससे जुड़े सभी अधिकारी किसी गलत गतिविधि में शामिल थे।

KG-D6 गैस विवाद: एक अलग और महत्वपूर्ण अध्याय

Reliance Industries और ONGC से जुड़ा KG-D6 गैस माइग्रेशन विवाद लंबे समय से कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा रहा है। दिल्ली हाईकोर्ट में दर्ज मामले के रिकॉर्ड के अनुसार, सरकार ने Justice A. P. Shah की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। Shah Committee की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने RIL के खिलाफ लगभग 1.552 अरब अमेरिकी डॉलर की मांग उठाई थी, जिसे गैस माइग्रेशन से कथित अनुचित लाभ से जोड़ा गया था।

यह मामला अदालतों में विभिन्न चरणों से गुजरा है। फरवरी 2025 के दिल्ली हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में DeGolyer & MacNaughton की रिपोर्ट, Shah Committee और सरकार द्वारा उठाई गई मांग का उल्लेख है। इसलिए इस पूरे प्रकरण को केवल एक पंक्ति में ‘गैस चोरी साबित हो गई’ कहना कानूनी स्थिति को अत्यधिक सरल बना देगा।

महत्वपूर्ण: किसी अदालत में सरकार द्वारा लगाया गया आरोप, किसी समिति की रिपोर्ट और अंतिम न्यायिक निष्कर्ष—ये तीनों अलग-अलग चीजें हैं। पत्रकारिता में इनका स्पष्ट अंतर रखना आवश्यक है।

बैंकिंग, स्पेक्ट्रम और कॉरपोरेट जवाबदेही

अनिल अंबानी से जुड़ी कंपनियों की वित्तीय कठिनाइयों और बैंकों के कर्ज को लेकर भी पिछले वर्षों में व्यापक सार्वजनिक चर्चा हुई है। लेकिन अलग-अलग कंपनियों, ऋण खातों, दिवालिया प्रक्रियाओं और स्पेक्ट्रम संबंधी मामलों को एक ही कॉरपोरेट समूह या एक ही व्यक्ति की वर्तमान व्यावसायिक स्थिति के साथ जोड़ना तथ्यात्मक रूप से सावधानी मांगता है।

इसी तरह यह कहना कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने किसी विशेष समूह को कितना कर्ज दिया, कितना NPA हुआ या कितना write-off किया—इसके लिए बैंक-वार और कंपनी-वार आधिकारिक आंकड़ों की आवश्यकता होती है। केवल सामान्य दावों के आधार पर कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

असल सवाल: ‘कूलिंग-ऑफ’ और पारदर्शिता

इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शायद किसी एक उद्योगपति या कंपनी से जुड़ा नहीं है। सवाल यह है कि भारत में वरिष्ठ सार्वजनिक पदों से निजी क्षेत्र में जाने वाले अधिकारियों के लिए हितों के टकराव से बचने के नियम कितने स्पष्ट हैं।

क्या संवेदनशील नियामक पदों के लिए अनिवार्य cooling-off period होना चाहिए? क्या सेवानिवृत्त अधिकारियों की निजी कंपनियों में नियुक्तियों का एक सार्वजनिक रजिस्टर होना चाहिए? क्या नियुक्ति से पहले conflict-of-interest declaration अनिवार्य होना चाहिए? और क्या नियुक्ति के बाद कुछ समय तक उन मामलों में भागीदारी पर प्रतिबंध होना चाहिए जिनकी निगरानी अधिकारी अपने सरकारी कार्यकाल में कर चुके थे?

जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल

लोकतंत्र में सरकारी संस्थानों पर भरोसा केवल कानून से नहीं, बल्कि पारदर्शिता से भी बनता है। इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि किसी पूर्व अधिकारी को निजी क्षेत्र में काम करने का अधिकार है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि ऐसी नियुक्तियों में प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, हितों के टकराव को कैसे रोका जाता है और जनता को निर्णयों की पर्याप्त जानकारी मिलती है या नहीं।

पूर्व सरकारी अधिकारियों का निजी क्षेत्र में जाना भारतीय अर्थव्यवस्था में विशेषज्ञता के आदान-प्रदान का हिस्सा हो सकता है। लेकिन जब नियुक्तियां ऐसे क्षेत्रों में हों जिनका संबंध सार्वजनिक नीति, बैंकिंग, टैक्स, ऊर्जा, नियमन या सरकारी संसाधनों से रहा हो, तब पारदर्शिता और जवाबदेही का महत्व और बढ़ जाता है।

Reliance समूह से जुड़े पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्तियों ने इसी व्यापक बहस को फिर सामने ला दिया है। उपलब्ध कॉरपोरेट रिकॉर्ड यह दिखाते हैं कि ऐसे कई पूर्व अधिकारी वास्तव में रिलायंस या उससे जुड़ी कंपनियों में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में आए। लेकिन इन नियुक्तियों को अपने-आप में किसी पूर्व सरकारी निर्णय के बदले में ‘इनाम’ या किसी अवैध व्यवस्था का प्रमाण कहना अलग दावा है, जिसके लिए स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य आवश्यक होंगे।

इसलिए सवाल पूछना जरूरी है—लेकिन सवाल तथ्यों के आधार पर हों। सार्वजनिक संस्थानों की विश्वसनीयता, निजी क्षेत्र की स्वतंत्रता और नागरिकों का भरोसा—तीनों के बीच संतुलन के लिए स्पष्ट नियम, पारदर्शी नियुक्तियां और मजबूत conflict-of-interest व्यवस्था आवश्यक हैं।

स्रोत और संदर्भ

  • Reliance Industries — Arundhati Bhattacharya का आधिकारिक बोर्ड प्रोफाइल।
  • Reliance Industries — K. V. Chowdary का आधिकारिक बोर्ड प्रोफाइल और नियुक्ति संबंधी कंपनी रिकॉर्ड।
  • Jio Financial Services — वर्तमान Board of Directors रिकॉर्ड, जिसमें Rajiv Mehrishi Independent Director के रूप में सूचीबद्ध हैं।
  • दिल्ली हाईकोर्ट — Union of India vs Reliance Industries Ltd. से संबंधित 2025 का न्यायिक रिकॉर्ड।
  • Indian Express और Business Standard — K. V. Chowdary की RIL बोर्ड नियुक्ति पर रिपोर्ट।
  • Navbharat Times/PTI — Sanjeev Singh की Reliance में नियुक्ति पर 2020 की रिपोर्ट।
  • मार्च 2025 की रिपोर्ट — M. K. Jain के Reliance से जुड़ने की खबर।

संपादकीय नोट: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कॉरपोरेट रिकॉर्ड, न्यायिक दस्तावेजों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित तथ्यात्मक विश्लेषण के रूप में तैयार किया गया है। इसमें व्यक्त प्रश्न और आलोचनात्मक दृष्टिकोण किसी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध अपराध का निष्कर्ष नहीं हैं। किसी आरोप, समिति की रिपोर्ट और न्यायिक रूप से स्थापित तथ्य के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। पाठकों को मूल दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर स्वयं निष्कर्ष निकालने चाहिए।

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