भारत की पहली महिला इंजीनियर

भारत की पहली महिला इंजीनियर

Engineers Day 2026: भारत की पहली महिला इंजीनियर ए. ललिता की प्रेरक कहानी
ENGINEERS DAY 2026

ये थीं भारत की पहली महिला इंजीनियर, 15 में शादी, 18 में बनीं मां, पति की मौत के बाद भी नहीं मानी हार

अय्यालासोमयाजुला ए. ललिता ने उस दौर में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, जब इंजीनियरिंग के क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी बेहद कम थी।

Engineers Day 2026: भारत में हर साल 15 सितंबर को राष्ट्रीय अभियंता दिवस मनाया जाता है। यह दिन महान इंजीनियर और भारत रत्न सर एम. विश्वेश्वरैया की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। इसी अवसर पर भारत की शुरुआती महिला इंजीनियरों में शामिल अय्यालासोमयाजुला ए. ललिता की कहानी हमें शिक्षा, संघर्ष और आत्मविश्वास की ताकत याद दिलाती है।
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अय्यालासोमयाजुला ए. ललिता — भारत की शुरुआती महिला इंजीनियरों में अग्रणी नाम

इंजीनियरिंग का क्षेत्र लंबे समय तक पुरुषों के वर्चस्व वाला क्षेत्र माना जाता रहा। एक समय ऐसा भी था जब लड़कियों के लिए इंजीनियरिंग को करियर के रूप में चुनना असामान्य समझा जाता था। ऐसे दौर में एक महिला ने न केवल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, बल्कि इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के रूप में अपना करियर भी बनाया।

उनका नाम था अय्यालासोमयाजुला ए. ललिता। उनका जीवन केवल एक इंजीनियर की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस महिला की कहानी है जिसने व्यक्तिगत मुश्किलों के बीच शिक्षा को चुना और तकनीकी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।

1919 27 अगस्त को मद्रास में जन्म
1943 इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री
1977 लंबे करियर के बाद सेवानिवृत्ति

15 साल की उम्र में हुई शादी

अय्यालासोमयाजुला ललिता का जन्म 27 अगस्त 1919 को मद्रास, वर्तमान चेन्नई में एक तेलुगु भाषी परिवार में हुआ था। उनके पिता पप्पू सुब्बा राव गिंडी स्थित कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से जुड़े प्रोफेसर थे।

उस समय लड़कियों की शिक्षा और उनके करियर को लेकर समाज की सोच आज से काफी अलग थी। ललिता की शादी महज 15 वर्ष की उम्र में हो गई थी। इसके बाद उन्होंने बेटी श्यामला को जन्म दिया।

बेटी के जन्म के करीब चार महीने बाद ही उनके पति का निधन हो गया। कम उम्र में विधवा होना और एक छोटी बच्ची की जिम्मेदारी संभालना उनके जीवन की बड़ी चुनौती थी। लेकिन ललिता ने परिस्थितियों को अपने भविष्य का फैसला नहीं करने दिया।

महिला इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा का प्रतीकात्मक चित्र
तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी आज ललिता जैसी अग्रणी महिलाओं की विरासत को आगे बढ़ाती है।

पिता ने दिया इंजीनियर बनने का हौसला

पति की मृत्यु के बाद ललिता के सामने अपने भविष्य के साथ-साथ अपनी बेटी की जिम्मेदारी भी थी। ऐसे समय में उनके पिता ने उनका साथ दिया। उन्होंने ललिता को उच्च शिक्षा जारी रखने और इंजीनियरिंग को करियर के रूप में चुनने के लिए प्रोत्साहित किया।

ललिता ने कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, गिंडी में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की। उस समय इंजीनियरिंग कॉलेजों में महिलाओं की संख्या बेहद कम थी। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार वह अपने कॉलेज में सैकड़ों पुरुष छात्रों के बीच अकेली महिला छात्रों में प्रमुख थीं।

कॉलेज प्रशासन ने उनके लिए अलग हॉस्टल की व्यवस्था की। उनके साथी छात्रों ने भी उनका सहयोग किया। इस वातावरण ने ललिता को अपनी पढ़ाई पूरी करने और तकनीकी क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर दिया।

1943 में रचा इतिहास

ललिता ने 1943 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। इसी उपलब्धि के साथ उनका नाम भारत की शुरुआती और पहली महिला इंजीनियरों के इतिहास में दर्ज हुआ।

उनके साथ उसी दौर में पी.के. थ्रेसिया और लीलाम्मा कोशी जैसी महिलाएं भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थीं। इन महिलाओं ने उस समय तकनीकी शिक्षा में महिलाओं की मौजूदगी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ललिता की कहानी बताती है कि कठिन परिस्थितियां किसी व्यक्ति के सपनों को समाप्त नहीं करतीं, यदि शिक्षा और आगे बढ़ने का संकल्प कायम रहे।

रेलवे वर्कशॉप से शुरू हुआ पेशेवर सफर

इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद ललिता ने व्यावहारिक प्रशिक्षण भी लिया। उन्होंने जमालपुर रेलवे वर्कशॉप में एक वर्ष की अप्रेंटिसशिप पूरी की। यह रेलवे की महत्वपूर्ण मरम्मत और ओवरहॉल सुविधाओं में से एक थी।

यहां उन्हें इंजीनियरिंग के वास्तविक काम का अनुभव मिला। यह प्रशिक्षण उनके पेशेवर जीवन की महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुआ और इसके बाद उन्होंने तकनीकी क्षेत्र में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालीं।

रेलवे से सरकारी तकनीकी विभाग तक

प्रशिक्षण के बाद ललिता ने शिमला स्थित सेंट्रल स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन के साथ काम किया। इस दौरान उन्होंने तकनीकी और शोध से जुड़े कार्य किए।

उन्होंने अपने पिता के साथ स्मोकलेस चूल्हों और एक इलेक्ट्रिकल म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट से जुड़े शोध कार्यों में भी सहयोग किया। इसके बाद उन्होंने ईस्ट इंडियन रेलवे के इलेक्ट्रिकल विभाग में काम किया।

आगे चलकर वह भारत सरकार के ऑफिस ऑफ द इलेक्ट्रिकल कमिश्नर में टेक्निकल असिस्टेंट के पद पर भी कार्यरत रहीं।

1948 में AEI से जुड़ीं

वर्ष 1948 में ललिता के करियर ने एक और महत्वपूर्ण मोड़ लिया। वह कलकत्ता की ब्रिटिश इंजीनियरिंग कंपनी Associated Electrical Industries यानी AEI से जुड़ीं।

यहां काम करते हुए उन्हें भारत की महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में योगदान देने का अवसर मिला। इसी दौरान उनका संबंध देश की ऐतिहासिक इंजीनियरिंग परियोजनाओं में शामिल भाखड़ा नांगल बांध परियोजना से भी हुआ।

भाखड़ा नांगल जैसी बड़ी परियोजनाओं में बिजली और ट्रांसमिशन से जुड़े तकनीकी कार्य महत्वपूर्ण थे।

भाखड़ा नांगल बांध पर किया महत्वपूर्ण काम

भाखड़ा नांगल बांध परियोजना स्वतंत्र भारत की शुरुआती बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में शामिल थी। इस परियोजना का उद्देश्य सिंचाई, बिजली उत्पादन और क्षेत्रीय विकास से जुड़ा था।

उपलब्ध विवरणों के अनुसार AEI में काम करते हुए ललिता ने परियोजना से जुड़े इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग कार्यों में योगदान दिया। उनकी जिम्मेदारियों में ट्रांसमिशन लाइनों और सबस्टेशन के लेआउट से जुड़े तकनीकी कार्य शामिल थे।

उस दौर में जब तकनीकी और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या बहुत कम थी, इतनी बड़ी परियोजना से जुड़ना उनके पेशेवर सफर की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।

करीब तीन दशक तक जारी रखा करियर

ललिता का पेशेवर जीवन किसी एक संस्था तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने लंबे समय तक AEI के साथ काम किया। बाद में कंपनी का अधिग्रहण जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी ने कर लिया।

लगभग तीन दशकों तक इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सक्रिय रहने के बाद उन्होंने 1977 में सेवानिवृत्ति ली। उनका करियर उस समय की महिलाओं के लिए एक अलग रास्ता बनाने वाला उदाहरण बन गया।

ललिता के जीवन की महत्वपूर्ण तारीखें

1919

27 अगस्त को मद्रास, वर्तमान चेन्नई में अय्यालासोमयाजुला ललिता का जन्म हुआ।

कम उम्र

लगभग 15 वर्ष की उम्र में उनका विवाह हुआ।

1937

उन्होंने बेटी श्यामला को जन्म दिया। बेटी के जन्म के कुछ महीने बाद उनके पति का निधन हो गया।

1943

इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की और भारत की शुरुआती महिला इंजीनियरों में अपना नाम दर्ज कराया।

1948

Associated Electrical Industries (AEI), कलकत्ता से जुड़ीं और बड़े इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स में काम किया।

1964

न्यूयॉर्क में आयोजित First International Conference of Women Engineers and Scientists में भारत की महिला इंजीनियरों का प्रतिनिधित्व किया।

1977

लंबे पेशेवर करियर के बाद सेवानिवृत्त हुईं।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत का प्रतिनिधित्व

ललिता की उपलब्धियां भारत तक सीमित नहीं रहीं। वर्ष 1964 में न्यूयॉर्क में आयोजित First International Conference of Women Engineers and Scientists में उन्होंने भारत की महिला इंजीनियरों का प्रतिनिधित्व किया।

यह उस समय की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, क्योंकि इंजीनियरिंग में महिलाओं की भागीदारी अभी शुरुआती दौर में थी। अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनकी मौजूदगी भारतीय महिला इंजीनियरों की क्षमता और बढ़ती पहचान का संकेत थी।

बेटी के लिए भी बनीं प्रेरणा

ललिता की कहानी केवल उनके अपने करियर तक सीमित नहीं रही। उनकी बेटी श्यामला ने भी शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़कर विज्ञान और गणित की पढ़ाई की तथा बाद में गणित की शिक्षिका बनीं।

इस तरह ललिता ने अपने जीवन से यह भी दिखाया कि शिक्षा का प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। एक महिला को मिलने वाला अवसर आने वाली पीढ़ी के लिए भी नई संभावनाओं का रास्ता खोल सकता है।

Engineers Day पर ललिता को याद करने की वजह

आज इंजीनियरिंग कॉलेजों में बड़ी संख्या में छात्राएं शिक्षा हासिल कर रही हैं। महिलाएं इलेक्ट्रिकल, सिविल, मैकेनिकल, कंप्यूटर, एयरोस्पेस और अनेक तकनीकी क्षेत्रों में काम कर रही हैं।

लेकिन इस बदलाव की शुरुआती यात्रा को समझने के लिए अय्यालासोमयाजुला ए. ललिता जैसी अग्रणी महिलाओं की कहानी महत्वपूर्ण है।

आज की पीढ़ी के लिए क्या संदेश देती है ललिता की कहानी?

ललिता का जीवन कई स्तरों पर प्रेरक है। उन्होंने व्यक्तिगत कठिनाइयों के बावजूद अपनी शिक्षा जारी रखी। उन्होंने उस क्षेत्र को चुना जिसमें उस समय महिलाओं की संख्या बेहद कम थी। उन्होंने पढ़ाई के बाद प्रशिक्षण लिया और वास्तविक इंजीनियरिंग परियोजनाओं में काम किया।

उनकी कहानी यह बताती है कि किसी व्यक्ति की परिस्थितियां उसके पूरे भविष्य को निर्धारित नहीं करतीं। शिक्षा, परिवार का सहयोग, आत्मविश्वास और अवसर मिलकर जीवन की दिशा बदल सकते हैं।

Engineers Day 2026 पर अय्यालासोमयाजुला ए. ललिता को याद करना भारतीय इंजीनियरिंग इतिहास के उस अध्याय को याद करना है, जब महिलाओं के लिए तकनीकी शिक्षा का रास्ता आज की तुलना में कहीं अधिक कठिन था।

15 वर्ष की उम्र में शादी, कम उम्र में मातृत्व, पति की असमय मृत्यु और उसके बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई—ललिता के जीवन में चुनौतियां कम नहीं थीं। फिर भी उन्होंने शिक्षा का रास्ता चुना और इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के रूप में अपनी पहचान बनाई।

उनका सफर केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं, बल्कि यह याद दिलाने वाला अध्याय है कि जब महिलाओं को शिक्षा और अवसर मिलते हैं, तो वे उन क्षेत्रों में भी इतिहास रच सकती हैं जिन्हें कभी केवल पुरुषों के लिए उपयुक्त माना जाता था।

स्रोत एवं तथ्य संबंधी नोट: लेख में उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों को आधार बनाया गया है। ललिता की इंजीनियरिंग डिग्री के वर्ष को लेकर कुछ स्रोतों में अंतर मिलता है; कई इंजीनियरिंग-संबंधी स्रोत 1943 को उनकी डिग्री का वर्ष बताते हैं। प्रकाशित करने से पहले स्थानीय संपादकीय मानकों के अनुसार स्रोतों और तिथियों का सत्यापन किया जा सकता है।
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