Gen-Z को वोट बैंक बनाने की होड़,
Gen-Z को वोट बैंक बनाने की होड़, लेकिन विधानसभा में कौन उठाएगा नई पीढ़ी की आवाज?
राजनीतिक दलों की नजर नई पीढ़ी पर है, लेकिन देश की विधानसभाओं में Gen-Z की भागीदारी अब भी बेहद सीमित दिखाई देती है।
देश की राजनीति में इन दिनों Gen-Z यानी नई पीढ़ी सबसे ज्यादा चर्चा में है। राजनीतिक दलों की नजर इस युवा वर्ग पर टिकी हुई है। सोशल मीडिया से लेकर चुनावी सभाओं तक, हर राजनीतिक पार्टी युवाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए नई रणनीतियां बना रही है।
युवाओं को भविष्य का सबसे बड़ा वोट बैंक माना जा रहा है, लेकिन जब सवाल विधानसभा में उनकी वास्तविक भागीदारी का आता है तो तस्वीर बेहद अलग दिखाई देती है।
उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा आंकड़े एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं।
अगर Gen-Z देश की राजनीति का भविष्य है, तो वर्तमान की राजनीति में उसकी आवाज कौन उठा रहा है?
देश में बड़ी संख्या में युवा मतदाता हैं। आने वाले वर्षों में Gen-Z की चुनावी ताकत और बढ़ेगी। इसके बावजूद विधानसभाओं में इस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व बेहद सीमित है।
विधानसभाओं में युवा प्रतिनिधित्व की तस्वीर
1 उत्तर प्रदेश में सीमित प्रतिनिधित्व
देश के सबसे बड़े राज्यों में शामिल उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यीय विधानसभा में Gen-Z विधायकों की संख्या बेहद कम बताई जाती है। समाजवादी पार्टी के युवा नेताओं में गाजीपुर की सैदपुर विधानसभा सीट से विधायक अंकित भारती और रायबरेली की हरचंदपुर विधानसभा सीट से विधायक राहुल राजपूत का नाम नई पीढ़ी के प्रतिनिधियों के रूप में सामने आता है।
राहुल राजपूत ने 2022 के विधानसभा चुनाव में कम उम्र में जीत दर्ज कर विशेष पहचान बनाई थी। उस समय उन्हें विधानसभा के सबसे युवा चेहरों में गिना गया था।
हालांकि उम्र बढ़ने के साथ किसी नेता की पीढ़ीगत श्रेणी में बदलाव हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि 403 सदस्यों वाले विशाल सदन में युवा और खासकर नई पीढ़ी की भागीदारी आखिर कितनी है?
2 बिहार में सिर्फ दो Gen-Z चेहरे
बिहार की 243 सदस्यीय विधानसभा में भी Gen-Z प्रतिनिधित्व सीमित है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 40 वर्ष या उससे कम उम्र के कई विधायक जरूर मौजूद हैं, लेकिन Gen-Z श्रेणी में आने वाले सदस्यों की संख्या बहुत कम है।
युवा चेहरों में मैथिली ठाकुर और सोनम रानी का नाम चर्चा में है। मैथिली ठाकुर अलीनगर और सोनम रानी त्रिवेणीगंज क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं।
युवा मतदाताओं के लिए इन चेहरों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि वे नई पीढ़ी की सोच, डिजिटल दुनिया और बदलती सामाजिक प्राथमिकताओं को अधिक नजदीक से समझने वाली पीढ़ी का हिस्सा मानी जाती हैं।
लेकिन 243 सदस्यों के सदन में केवल दो Gen-Z प्रतिनिधि होना इस बात को भी दर्शाता है कि युवा मतदाता बड़ी संख्या में होने के बावजूद चुनावी टिकट और राजनीतिक अवसरों में उनकी हिस्सेदारी सीमित है।
3 झारखंड में Gen-Z का खाता तक नहीं
झारखंड विधानसभा की तस्वीर और भी चौंकाने वाली है। 81 सदस्यीय विधानसभा में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार Gen-Z श्रेणी का कोई विधायक मौजूद नहीं है।
40 वर्ष या उससे कम उम्र के कुछ युवा विधायक जरूर हैं, लेकिन उन्हें मुख्य रूप से मिलेनियल पीढ़ी से जोड़ा जाता है।
यह स्थिति बताती है कि युवा नेतृत्व और Gen-Z नेतृत्व में अंतर है। किसी विधायक का युवा होना जरूरी नहीं कि वह Gen-Z पीढ़ी का भी प्रतिनिधि हो।
झारखंड जैसे राज्य में रोजगार, शिक्षा, पलायन, डिजिटल अवसर और आदिवासी युवाओं से जुड़े मुद्दे लगातार महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में नई पीढ़ी की सीधी राजनीतिक भागीदारी का अभाव गंभीर बहस का विषय बन सकता है।
4 राजस्थान में रविन्द्र सिंह भाटी अकेले प्रतिनिधि
राजस्थान की 200 सदस्यीय विधानसभा में Gen-Z का प्रतिनिधित्व लगभग नाममात्र का है। नई पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में सबसे प्रमुख नाम रविन्द्र सिंह भाटी का सामने आता है।
बाड़मेर जिले की शिव विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक भाटी ने खासकर युवाओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाई है।
उनकी सभाओं और बैठकों में युवाओं की बड़ी भागीदारी देखने को मिलती रही है। सोशल मीडिया पर भी उनका प्रभाव मजबूत माना जाता है।
राजस्थान की बड़ी युवा आबादी के मुकाबले विधानसभा में केवल एक Gen-Z विधायक होना राजनीतिक दलों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है।
5 हिमाचल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी खाली जगह
हिमाचल प्रदेश विधानसभा में भी फिलहाल Gen-Z का कोई प्रतिनिधि नहीं बताया जाता। हालांकि 30 से 40 वर्ष के बीच उम्र वाले कई विधायक मौजूद हैं। पंचायतों और स्थानीय निकायों में जरूर नई पीढ़ी की भागीदारी बढ़ रही है, जो भविष्य की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण संकेत है।
मध्य प्रदेश की 230 सदस्यीय विधानसभा में भी Gen-Z विधायक का अभाव बताया जाता है। राज्य में युवा नेता और युवा मंत्री मौजूद हैं, लेकिन Gen-Z की सीधी हिस्सेदारी अभी विधानसभा तक नहीं पहुंच पाई है।
इसी तरह छत्तीसगढ़ की 90 सदस्यीय विधानसभा में भी नई पीढ़ी का कोई विधायक मौजूद नहीं होने की बात सामने आती है। राज्य की राजनीति में युवा नेताओं की मौजूदगी जरूर है, लेकिन वे मुख्यतः Gen-Z से पहले की पीढ़ी से जुड़े हैं।
6 हरियाणा में नई पीढ़ी की उम्मीद
हरियाणा की राजनीति में युवा प्रतिनिधित्व को लेकर कुछ अलग तस्वीर दिखाई देती है। 90 सदस्यीय विधानसभा में युवा विधायकों की संख्या सीमित है, लेकिन Gen-Z पीढ़ी से जुड़े आदित्य सुरजेवाला जैसे युवा चेहरे ने राजनीतिक चर्चा को नई दिशा दी है।
कम उम्र में विधानसभा पहुंचने वाले नेताओं की सफलता यह साबित करती है कि यदि राजनीतिक दल युवाओं को टिकट और अवसर दें तो नई पीढ़ी चुनाव जीतकर सदन तक पहुंच सकती है।
असली सवाल—वोट देगा कौन और आवाज उठाएगा कौन?
देश की राजनीति में Gen-Z को लेकर सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि राजनीतिक दल उन्हें सोशल मीडिया, डिजिटल अभियान और युवा सम्मेलनों के जरिए अपने साथ जोड़ना चाहते हैं, लेकिन चुनावी टिकट देने के मामले में नई पीढ़ी को पर्याप्त अवसर नहीं मिलते।
Gen-Z सिर्फ भविष्य का वोट बैंक नहीं है। यह वर्तमान का भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक वर्ग बन चुका है। रोजगार, शिक्षा, स्टार्टअप, डिजिटल अर्थव्यवस्था, महंगाई, पर्यावरण और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे इस पीढ़ी की प्राथमिकताओं में शामिल हैं।
अब सवाल केवल यह नहीं है कि Gen-Z चुनाव में किस पार्टी को वोट देगा। असली सवाल यह है कि विधानसभा के भीतर उसकी भाषा कौन बोलेगा?
उसकी समस्याएं कौन उठाएगा और उसके भविष्य से जुड़े फैसलों में उसकी भागीदारी कितनी होगी? भारत की राजनीति धीरे-धीरे एक पीढ़ीगत बदलाव के दौर से गुजर रही है।
आने वाले चुनावों में संभव है कि राजनीतिक दल सिर्फ Gen-Z के वोट हासिल करने की रणनीति न बनाएं, बल्कि उन्हें उम्मीदवार बनाकर सदन तक भी पहुंचाएं।
क्योंकि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व केवल वोट देने का अधिकार नहीं है, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपनी पीढ़ी की सीधी भागीदारी भी है।
Gen-Z को राजनीतिक दलों ने वोटर के रूप में पहचान लिया है।
अब देखना यह है कि उसे नेता के रूप में कब स्वीकार किया जाता है।
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