अंबेडकर की राह पर मोदी
अंबेडकर की राह पर मोदी
भाजपा की बदलती राजनीति और सामाजिक समीकरणों पर सवाल
भारतीय राजनीति में सत्ता केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक संदेश देने का भी एक बड़ा मंच होती है। किसी राजनीतिक दल के संगठनात्मक विस्तार में किन वर्गों, समुदायों और सामाजिक समूहों को स्थान मिलता है, यह अक्सर उस दल की प्राथमिकताओं और भविष्य की राजनीति का संकेत देता है। भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली इकाई के हालिया संगठनात्मक विस्तार को लेकर भी ऐसे ही सवाल उठ रहे हैं।
सामाजिक प्रतिनिधित्व पर उठते सवाल
राजनीतिक आलोचकों का कहना है कि नए संगठन में सवर्ण समाज के प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चा तेज हुई है। कुछ लोगों का आरोप है कि पार्टी ने जिन सामाजिक वर्गों से लंबे समय तक राजनीतिक समर्थन प्राप्त किया, उन्हें संगठनात्मक जिम्मेदारियों में पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया। हालांकि, किसी भी संगठनात्मक नियुक्ति का मूल्यांकन केवल जाति के आधार पर करना उचित नहीं हो सकता, लेकिन भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में सामाजिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न राजनीति से अलग भी नहीं किया जा सकता।
यहीं से भाजपा की बदलती सामाजिक राजनीति पर बहस शुरू होती है। क्या भाजपा अब अपनी पारंपरिक सामाजिक पहचान से आगे बढ़कर एक नए सामाजिक गठबंधन की राजनीति कर रही है? क्या पार्टी का मुख्य फोकस दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों के बीच अपना विस्तार करना है? यदि ऐसा है, तो यह भारतीय राजनीति में कोई असामान्य घटना नहीं है। लगभग हर बड़े राजनीतिक दल ने समय-समय पर अपने सामाजिक आधार को बदलने और नए मतदाता समूहों तक पहुंचने की कोशिश की है।
लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी पूंजी केवल वोट नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है।
अंबेडकर की विचारधारा और सामाजिक न्याय
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय, समान अवसर और वंचित वर्गों की भागीदारी को विशेष महत्व दिया था। आज भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दलित, पिछड़े और गरीब वर्गों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। समर्थक इसे सामाजिक समावेश की राजनीति बताते हैं, जबकि आलोचक सवाल करते हैं कि क्या इस प्रक्रिया में पुराने समर्थक वर्गों की उपेक्षा हो रही है।
यही भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है। राजनीतिक दल अक्सर जिस सामाजिक वर्ग की ताकत से सत्ता के शिखर तक पहुंचते हैं, सत्ता मिलने के बाद उनका ध्यान नए सामाजिक समीकरण बनाने की ओर बढ़ जाता है। कांग्रेस ने भी अपने लंबे राजनीतिक इतिहास में अलग-अलग सामाजिक समूहों को साधने की कोशिश की। जनता दल और उसके बाद उभरे अनेक क्षेत्रीय दलों ने भी जातीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति को अपनी शक्ति बनाया। भाजपा भी इस राजनीतिक परंपरा से अलग नहीं दिखाई देती।
क्या पुराने समर्थकों को भूल रही है राजनीति?
आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी दल को केवल अपने पुराने समर्थकों के साथ ही खड़ा रहना चाहिए या उसे समाज के हर वर्ग तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए? लोकतंत्र में किसी पार्टी का विस्तार स्वाभाविक है, लेकिन विस्तार की प्रक्रिया में किसी समुदाय को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उसे केवल वोट के समय याद किया जाता है और सत्ता मिलने के बाद उसकी भूमिका समाप्त हो जाती है।
राजनीति में विश्वास सबसे बड़ी पूंजी है। वोटर केवल घोषणापत्र नहीं पढ़ता, वह नेताओं के व्यवहार, संगठन में प्रतिनिधित्व और सरकार के फैसलों को भी देखता है। यदि जनता को यह लगने लगे कि उसके समर्थन का सम्मान नहीं हो रहा, तो उसका राजनीतिक व्यवहार बदलने में अधिक समय नहीं लगता।
सत्ता अस्थायी हो सकती है, लेकिन जनता की स्मृति में वही नेता रहता है जिसके काम समाज और देश पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ते हैं।
भाजपा और मोदी के सामने बड़ी चुनौती
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के सामने भी यही चुनौती है कि वे विकास, सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं। केवल चुनाव जीतना पर्याप्त नहीं है। लंबे समय तक जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि हर वर्ग को यह महसूस हो कि देश और सरकार की व्यवस्था में उसकी भागीदारी है।
राजनीति में उम्र, पद और सत्ता का भी अपना एक सत्य है। कोई भी व्यक्ति या नेता हमेशा के लिए सत्ता में नहीं रहता। इतिहास में अनेक बड़े नेता आए और चले गए। लेकिन समय बीतने के बाद लोगों की स्मृति में वही नेता अधिक समय तक बने रहते हैं, जिनके काम ने समाज और देश पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ा।
इतिहास कामों से याद रखता है
भारत में अटल बिहारी वाजपेयी और लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं को आज भी उनके व्यक्तित्व और कार्यों के कारण याद किया जाता है। इतिहास अंततः केवल पद का मूल्यांकन नहीं करता, बल्कि उस पद पर रहते हुए किए गए कामों का भी मूल्यांकन करता है।
आज देश को ऐसी राजनीति की आवश्यकता है जो केवल चुनावी गणित तक सीमित न हो। देश को आगे बढ़ाने वाली नीतियां, रोजगार, शिक्षा, सामाजिक न्याय, आर्थिक अवसर और राष्ट्रीय संसाधनों की सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण विषय हैं। राजनीतिक दलों को अपने समर्थकों को केवल चुनावी कार्यकर्ता नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का सहभागी मानना चाहिए।
देश के सामने यह भी चुनौती है कि सार्वजनिक धन और राष्ट्रीय संसाधनों की रक्षा हो तथा जो लोग कानून या आर्थिक दायित्वों से बचने के लिए देश छोड़ चुके हैं, उनसे कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। राष्ट्रहित की राजनीति का अर्थ केवल नारे देना नहीं, बल्कि संस्थाओं को मजबूत करना और जनता का विश्वास कायम रखना भी है।
जनता का फैसला अंतिम होता है
अंततः लोकतंत्र में जनता को लंबे समय तक भ्रमित नहीं किया जा सकता। जनता चुनाव के समय नेताओं को सुनती है, लेकिन समय आने पर उनके कार्यों का हिसाब भी करती है। भाजपा हो, कांग्रेस हो या कोई अन्य दल—हर राजनीतिक शक्ति को यह समझना होगा कि सत्ता अस्थायी है, लेकिन जनता का निर्णय अंतिम होता है।
प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के लिए भी यही समय है कि वे सामाजिक संतुलन, विकास और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के बीच ऐसा रास्ता चुनें जो भविष्य में केवल राजनीतिक सफलता के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की एक सकारात्मक यात्रा के रूप में याद किया जाए। यही रास्ता वास्तव में सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और भारत के भविष्य को मजबूत कर सकता है।
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