चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति
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चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति

चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति: हिंद महासागर में भारत को घेरने की रणनीति?
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चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति: हिंद महासागर में भारत को घेरने की रणनीति?

ग्वादर से हंबनटोटा और क्याउकफ्यू से मालदीव तक चीन की समुद्री मौजूदगी को समझिए।
जब भी चीन की रणनीति और भारत की समुद्री सुरक्षा की चर्चा होती है, ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) शब्द बार-बार सामने आता है। इसका शाब्दिक अर्थ है—मोतियों की माला। रणनीतिक संदर्भ में यह उन बंदरगाहों, समुद्री सुविधाओं और संपर्क परियोजनाओं की श्रृंखला के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जिनके जरिए चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी आर्थिक और रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाता रहा है।

इस अवधारणा में पाकिस्तान के ग्वादर, श्रीलंका के हंबनटोटा, म्यांमार के क्याउकफ्यू और हिंद महासागर के दूसरे महत्वपूर्ण स्थानों का उल्लेख किया जाता है। हालांकि एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ चीन की आधिकारिक घोषित सैन्य नीति का नाम नहीं है।

यह शब्द मुख्यतः रणनीतिक विश्लेषणों में चीन की समुद्री गतिविधियों को समझाने के लिए इस्तेमाल हुआ है। इसी वजह से इस अवधारणा को समझते समय आर्थिक निवेश, व्यापारिक परियोजनाओं और संभावित सैन्य उपयोग के बीच अंतर करना बेहद जरूरी है।

🔎 एक नजर में

‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ चीन की समुद्री गतिविधियों को समझने वाली एक रणनीतिक अवधारणा है। इसमें हिंद महासागर के आसपास चीन की बंदरगाह परियोजनाओं, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और समुद्री संपर्क को एक व्यापक रणनीतिक तस्वीर में देखा जाता है।

आखिर क्या है ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’?

सरल भाषा में समझें तो चीन ने एशिया और हिंद महासागर के आसपास कई देशों में बंदरगाहों, इंफ्रास्ट्रक्चर और समुद्री संपर्क परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। इन परियोजनाओं को चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और Maritime Silk Road से भी जोड़ा जाता है।

रणनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि इन स्थानों की श्रृंखला चीन को हिंद महासागर में अपने व्यापारिक जहाजों, ऊर्जा आपूर्ति और लॉजिस्टिक गतिविधियों के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकती है।

दूसरी ओर, चीन आम तौर पर इन परियोजनाओं को आर्थिक विकास, व्यापार और कनेक्टिविटी से जोड़कर प्रस्तुत करता है। इसलिए ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ की बहस केवल आर्थिक नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा और भू-राजनीति से भी जुड़ी हुई है।

1

ग्वादर पोर्ट

पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट अरब सागर में स्थित है और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी CPEC का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

2

हंबनटोटा

श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह चीन की समुद्री मौजूदगी पर होने वाली रणनीतिक चर्चा का प्रमुख उदाहरण है।

3

क्याउकफ्यू

म्यांमार में स्थित क्याउकफ्यू चीन के लिए समुद्री संपर्क और ऊर्जा परिवहन के लिहाज से महत्वपूर्ण परियोजना माना जाता है।

4

मालदीव

हिंद महासागर में महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के करीब होने के कारण मालदीव का रणनीतिक महत्व भारत और चीन दोनों के लिए है।

ग्वादर से शुरू होती है रणनीतिक चर्चा

पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट इस पूरी अवधारणा में सबसे अधिक चर्चित स्थानों में से एक है। अरब सागर में स्थित ग्वादर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

चीन की मौजूदगी के कारण यह बंदरगाह रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत के लिए इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह अरब सागर में भारत के पश्चिमी समुद्री क्षेत्र के सामने स्थित है।

📌 जरूरी तथ्य

किसी बंदरगाह में चीनी निवेश होना अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि वह चीनी सैन्य अड्डा बन चुका है। बंदरगाह की वास्तविक भूमिका और उसके संभावित सैन्य उपयोग को अलग-अलग समझना जरूरी है।

श्रीलंका का हंबनटोटा क्यों चर्चा में रहता है?

श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट भी चीन की समुद्री रणनीति की चर्चा में प्रमुख उदाहरण है। श्रीलंका ने 2017 में बंदरगाह का संचालन चीन की एक कंपनी को 99 साल की लीज पर दिया था।

इस घटनाक्रम के बाद भारत सहित कई देशों में रणनीतिक चिंताएं सामने आईं। हालांकि हंबनटोटा को सीधे चीनी सैन्य अड्डा कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। इसका मूल स्वरूप एक वाणिज्यिक बंदरगाह का है, लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति के कारण इसके संभावित रणनीतिक उपयोग पर लगातार चर्चा होती रही है।

किसी परियोजना का आर्थिक स्वरूप और उसका संभावित रणनीतिक उपयोग एक ही बात नहीं है। इसी अंतर को समझना ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ की पूरी बहस को समझने के लिए जरूरी है।

म्यांमार का क्याउकफ्यू और बंगाल की खाड़ी

म्यांमार का क्याउकफ्यू पोर्ट चीन के लिए विशेष महत्व रखता है। यह बंगाल की खाड़ी के करीब स्थित है और चीन ने यहां बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश किए हैं।

क्याउकफ्यू के साथ चीन के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि म्यांमार के रास्ते ऊर्जा और व्यापारिक संपर्क को चीन के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से तक पहुंचाया जा सकता है। इससे चीन को समुद्री व्यापार मार्गों के विकल्प मिलते हैं।

इसी क्षेत्र में कोको द्वीप समूह को लेकर भी लंबे समय से चर्चाएं होती रही हैं। कुछ रिपोर्टों में चीनी निगरानी गतिविधियों के आरोप लगाए गए हैं, लेकिन वहां मौजूद सुविधाओं को सीधे चीनी सैन्य अड्डा साबित करने के लिए सार्वजनिक प्रमाणों की स्थिति पर भी अलग-अलग विश्लेषण सामने आए हैं।

मालदीव का ‘मोतियों’ वाली रणनीति से क्या संबंध?

मालदीव हिंद महासागर के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के करीब स्थित है। इसलिए चीन और भारत दोनों के लिए इसका रणनीतिक महत्व है।

फेयधू फिनोल्हु नामक द्वीप को 2016 में एक चीनी कंपनी को 50 साल की लीज पर दिए जाने की खबर के बाद भारत में रणनीतिक चिंताएं बढ़ीं। बाद में द्वीप पर निर्माण और भूमि-विस्तार को लेकर भी सवाल उठे।

हालांकि उपलब्ध रणनीतिक विश्लेषणों में इस परियोजना के व्यावसायिक स्वरूप और सैन्य उपयोग को लेकर अलग-अलग निष्कर्ष सामने आए हैं। इसलिए इसे सीधे चीनी सैन्य अड्डा कहना सावधानी के बिना किया गया निष्कर्ष होगा।

चीन ऐसा क्यों कर रहा है?

चीन की ऊर्जा जरूरतें और वैश्विक व्यापार उसके समुद्री मार्गों पर काफी निर्भर हैं। मध्य पूर्व से आने वाला तेल और अन्य सामान समुद्री रास्तों से चीन पहुंचता है।

ऐसे में चीन के लिए हिंद महासागर केवल भारत के आसपास का समुद्री क्षेत्र नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण गलियारा है।

बंदरगाहों और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश से चीन को व्यापारिक संपर्क, लॉजिस्टिक सुविधाएं और वैकल्पिक परिवहन मार्ग मिल सकते हैं। रणनीतिक विश्लेषक इसी नेटवर्क को संभावित भविष्य के सैन्य उपयोग के नजरिए से भी देखते हैं।

🌊 हिंद महासागर व्यापार और ऊर्जा का महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्र
⚓ बंदरगाह व्यापारिक और लॉजिस्टिक संपर्क का प्रमुख माध्यम
🛰️ रणनीतिक महत्व समुद्री निगरानी और सुरक्षा के नजरिए से अहम

भारत के लिए चुनौती क्या है?

भारत के लिए हिंद महासागर अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश की समुद्री अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों से जुड़ा है।

इसी वजह से भारत ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप और अपने पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्री क्षेत्रों में निगरानी और नौसैनिक क्षमता को मजबूत करने पर जोर दिया है।

भारत के लिए चुनौती केवल यह नहीं है कि चीन कहां बंदरगाह बना रहा है, बल्कि यह भी है कि भविष्य में इन बंदरगाहों और सुविधाओं का उपयोग किस तरह किया जाता है।

क्या ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ भारत को पूरी तरह घेर चुका है?

इस सवाल का जवाब सीधे ‘हां’ देना सही नहीं होगा।

‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ मुख्यतः एक रणनीतिक अवधारणा है, जिसे चीन की विभिन्न समुद्री और आर्थिक परियोजनाओं को एक व्यापक तस्वीर में देखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

हर चीनी निवेश या बंदरगाह को सैन्य अड्डा मानना तथ्यों से मेल नहीं खाता। वास्तविकता यह है कि चीन हिंद महासागर में अपनी आर्थिक और रणनीतिक मौजूदगी बढ़ा रहा है, जबकि भारत भी इस क्षेत्र में अपनी समुद्री क्षमताओं और साझेदारियों को मजबूत कर रहा है।

‘मोतियों की माला’ यानी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स को समझने के लिए केवल बंदरगाहों की सूची देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे चीन की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक हित, BRI, समुद्री संपर्क और हिंद महासागर में बढ़ती रणनीतिक मौजूदगी जैसे कई पहलू जुड़े हैं।

ग्वादर, हंबनटोटा, क्याउकफ्यू और मालदीव जैसे स्थानों ने इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाया है। लेकिन इन सभी जगहों की भूमिका एक जैसी नहीं है और किसी परियोजना के व्यावसायिक स्वरूप तथा संभावित सैन्य उपयोग के बीच अंतर करना जरूरी है।

भारत के लिए इसका सबसे बड़ा महत्व यह है कि हिंद महासागर आने वाले वर्षों में एशिया की भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना रहेगा। चीन की समुद्री गतिविधियों पर नजर रखना और अपनी समुद्री सुरक्षा क्षमता बढ़ाना इसी व्यापक रणनीतिक परिदृश्य का हिस्सा है।

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