यूपी में 9 साल का ‘एनकाउंटर मॉडल’:
यूपी में 9 साल का ‘एनकाउंटर मॉडल’: 17 हजार से ज्यादा मुठभेड़, 289 अपराधी ढेर
मार्च 2017 से अब तक उत्तर प्रदेश में पुलिस और अपराधियों के बीच हुई मुठभेड़ों के आंकड़े क्या कहते हैं? जानिए जोनवार कार्रवाई, पुलिस को हुए नुकसान और इलाहाबाद हाईकोर्ट की गंभीर चिंता की पूरी कहानी।
9 साल की कार्रवाई के बड़े आंकड़े
मेरठ जोन सबसे आगे, वाराणसी और आगरा भी पीछे नहीं
सरकारी आंकड़ों में अलग-अलग पुलिस जोन और कमिश्नरेट की कार्रवाई में काफी अंतर दिखाई देता है। अपराधियों के मारे जाने और मुठभेड़ों की संख्या के मामले में मेरठ जोन सबसे आगे रहा।
| पुलिस जोन | मुठभेड़ | मारे गए | घायल आरोपी | गिरफ्तार |
|---|---|---|---|---|
| मेरठ जोन | 4,813 | 97 | 3,513 | 8,921 |
| वाराणसी जोन | 1,292 | 29 | 907 | 2,426 |
| आगरा जोन | 2,494 | 24 | 968 | 5,845 |
मेरठ जोन में कुल 4,813 मुठभेड़ दर्ज की गईं। इनमें 97 अपराधी मारे गए, 3,513 घायल हुए और 8,921 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।
इसके बाद वाराणसी जोन का स्थान आता है। यहां 1,292 मुठभेड़ों में 29 अपराधी मारे गए, जबकि 907 घायल और 2,426 गिरफ्तार किए गए।
आगरा जोन में 2,494 मुठभेड़ हुईं। यहां 24 अपराधी मारे गए, 968 घायल हुए और 5,845 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।
इसके अलावा बरेली, लखनऊ, गाजियाबाद कमिश्नरेट, कानपुर, प्रयागराज और गौतम बुद्ध नगर कमिश्नरेट में भी पुलिस और अपराधियों के बीच बड़ी संख्या में मुठभेड़ दर्ज की गई हैं।
सिर्फ अपराधी ही नहीं, पुलिस ने भी गंवाई जान
पुलिसकर्मियों की शहादत और चोटें
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में अपराधियों से मुठभेड़ के दौरान 18 पुलिसकर्मी शहीद हुए, जबकि 1,852 पुलिस अधिकारी और जवान घायल हुए।
मेरठ जोन में ही अपराधियों से लड़ते हुए 2 पुलिसकर्मी शहीद हुए और 477 घायल हुए। वाराणसी जोन में 104 और आगरा जोन में 62 पुलिसकर्मी घायल होने की जानकारी दी गई है।
यह आंकड़ा बताता है कि कानून-व्यवस्था की कार्रवाई में पुलिसकर्मियों को भी गंभीर जोखिम उठाना पड़ा है। हालांकि, ऐसे अभियानों की सफलता का मूल्यांकन केवल मारे गए या गिरफ्तार अपराधियों की संख्या से नहीं, बल्कि अपराध नियंत्रण, दोषसिद्धि और कानून के पालन जैसे व्यापक मानकों से भी किया जाना जरूरी है।
सरकार का दावा: राष्ट्रीय औसत से कम अपराध दर
योगी सरकार के कार्यकाल में पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि प्रदेश में अपराध पर प्रभावी नियंत्रण हुआ है। दिए गए आंकड़ों के अनुसार, यूपी में संज्ञेय अपराध की दर राष्ट्रीय औसत से करीब 28.5 प्रतिशत कम रही।
आंकड़ों के मुताबिक देश में प्रति एक लाख आबादी पर औसतन 252.3 संज्ञेय अपराध दर्ज हुए, जबकि उत्तर प्रदेश में यह दर 180.2 बताई गई है। राज्य में दर्ज कुल 4,30,552 संज्ञेय मामलों में से 2,21,615 मामले IPC और 2,08,937 मामले BNS के तहत दर्ज बताए गए हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल
⚖ न्यायपालिका की चिंता भी महत्वपूर्ण
पुलिस एनकाउंटर मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण दूसरा पहलू न्यायपालिका की चिंता है। 31 जनवरी 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा आरोपियों के पैर में गोली मारने की कथित बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर टिप्पणी की थी।
मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पुलिस कार्रवाई में कानून और स्थापित प्रक्रिया के पालन पर जोर दिया। अदालत ने इस तरह की कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट के PUCL दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया।
रिपोर्टों के मुताबिक अदालत ने पुलिस कार्रवाई में नियमों के पालन को लेकर राज्य के डीजीपी और गृह सचिव से जवाब मांगा तथा पुलिस अधिकारियों के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए। अदालत की चिंता का मूल सवाल यही है कि अपराध के खिलाफ कठोर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन वह कानून और स्थापित प्रक्रिया के दायरे में होनी चाहिए।
2026 में भी जारी है अभियान
मार्च 2017 से
उत्तर प्रदेश में अपराध और संगठित अपराध के खिलाफ पुलिस की आक्रामक कार्रवाई का दौर जारी रहा।
करीब 9 वर्षों में
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 17,043 पुलिस मुठभेड़ दर्ज की गईं।
2026 के शुरुआती पांच महीने
सरकार के मुताबिक पुलिस मुठभेड़ों में 23 अपराधी मारे जा चुके हैं।
सरकार के मुताबिक वर्ष 2026 के शुरुआती पांच महीनों में ही पुलिस मुठभेड़ों में 23 अपराधी मारे जा चुके हैं। इससे संकेत मिलता है कि एनकाउंटर आधारित पुलिसिंग अभी भी राज्य की कानून-व्यवस्था रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।
लेकिन आने वाले समय में इस मॉडल की असली परीक्षा सिर्फ आंकड़ों से नहीं होगी। सवाल यह भी रहेगा कि मुठभेड़ों में हर कार्रवाई कितनी पारदर्शी थी, जांच कितनी निष्पक्ष हुई, अदालतों में मामलों का परिणाम क्या रहा और आम नागरिकों में कानून के प्रति विश्वास कितना मजबूत हुआ।
उत्तर प्रदेश में पिछले नौ वर्षों की पुलिस कार्रवाई निश्चित रूप से बड़े पैमाने की रही है। 17,043 मुठभेड़, 289 अपराधियों की मौत, 11,834 घायल और 34,253 गिरफ्तारियां इस अभियान के विशाल आकार को दिखाती हैं।
सरकार इसे अपराध के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई मानती है, जबकि न्यायपालिका ने यह स्पष्ट किया है कि अपराध नियंत्रण के साथ कानून का शासन और उचित प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
इसलिए यूपी के एनकाउंटर मॉडल की पूरी कहानी दो पहलुओं में देखनी होगी—एक तरफ अपराधियों के खिलाफ कठोर पुलिस कार्रवाई और दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करना कि हर कार्रवाई संविधान, कानून और न्यायिक दिशानिर्देशों के अनुरूप हो।
आखिरकार मजबूत कानून-व्यवस्था वही मानी जाएगी, जिसमें अपराधी कानून से डरें और आम नागरिक को भी कानून पर पूरा भरोसा रहे।
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