हरियाणा के गांवों में बदल रही शादी की रीत

हरियाणा के गांवों में बदल रही शादी की रीत

बेटी को घोड़ी पर बैठाकर तोड़ी परंपरा, हरियाणा के गांवों में बदल रही शादी की रीत
समाज में बदलती सोच और बेटियों को समान अधिकार देने की प्रेरक कहानी
समाज / परंपरा / महिला सम्मान

बेटी को घोड़ी पर बैठाकर तोड़ी परंपरा, हरियाणा के गांवों में बदल रही शादी की रीत

हरियाणा के चोरटापुर बाड़ा गांव में शादी से पहले रितु यादव की घुड़चढ़ी निकाली गई। जिस रस्म को आमतौर पर दूल्हे से जोड़ा जाता है, उसे बेटी के लिए निभाकर परिवार ने बेटियों को बराबरी का सम्मान देने का संदेश दिया।

हरियाणा के गांवों में शादी-ब्याह से जुड़ी कई परंपराएं लंबे समय से चली आ रही हैं। इनमें से कुछ रस्में पारंपरिक रूप से बेटों की शादी तक सीमित मानी जाती रही हैं। लेकिन बदलते समय के साथ समाज में सोच भी बदल रही है। इसका एक प्रेरक उदाहरण हिसार जिले के हांसी क्षेत्र के गांव चोरटापुर बाड़ा में देखने को मिला, जहां परिवार ने बेटी की शादी से पहले उसकी घुड़चढ़ी निकालकर वर्षों पुरानी परंपरा को एक नए रूप में सामने रखा।

यह घटना 1 दिसंबर 2025 की है। गांव की गलियों में उस दिन नजारा कुछ अलग था। घोड़ी पर दूल्हे की जगह दुल्हन बनने जा रही रितु यादव सवार थीं। परिवार के लोग और ग्रामीण उनके साथ चल रहे थे। देखने वालों के लिए यह दृश्य भले ही नया रहा हो, लेकिन परिवार के लिए यह केवल शादी की एक रस्म नहीं थी। इसके पीछे बेटी को बेटे के समान अधिकार और सम्मान देने की सोच थी।

“जब बेटी पढ़ाई और नौकरी में आगे बढ़ सकती है, तो शादी की खुशियों और पारिवारिक परंपराओं में भी उसे बराबर स्थान क्यों न मिले?”

बेटे की तरह बेटी की भी निकाली घुड़चढ़ी

हरियाणा समेत उत्तर भारत के कई इलाकों में शादी से पहले दूल्हे की घुड़चढ़ी या बनवारा निकालने की परंपरा रही है। इसमें दूल्हा घोड़ी पर सवार होकर परिवार और रिश्तेदारों के साथ गांव या मोहल्ले में निकलता है।

चोरटापुर बाड़ा में परिवार ने इसी रस्म को बेटी के लिए निभाया। रितु यादव को घोड़ी पर बैठाकर बनवारा निकाला गया। परिवार का संदेश साफ था कि यदि बेटियां शिक्षा, नौकरी और जिम्मेदारियों में बेटों के बराबर आगे बढ़ सकती हैं तो शादी की खुशियों और पारिवारिक परंपराओं में भी उन्हें बराबर स्थान मिलना चाहिए।

यह पहल इसलिए भी खास रही क्योंकि इसे केवल दिखावे के लिए नहीं किया गया था। परिवार लंबे समय से रितु की शिक्षा और करियर को लेकर गंभीर रहा है।

परिवार ने बेटी की पढ़ाई में नहीं छोड़ी कोई कमी

रितु यादव की शिक्षा और करियर से जुड़ी तस्वीर
रितु यादव ने शिक्षा पूरी करने के बाद बैंकिंग क्षेत्र में करियर बनाया

रितु यादव की कहानी केवल उनकी शादी की घुड़चढ़ी तक सीमित नहीं है। परिवार ने बचपन से ही उनकी शिक्षा को महत्व दिया। उन्हें पढ़ाई के लिए दिल्ली भेजा गया, जहां उन्होंने स्नातक और एमए की पढ़ाई पूरी की।

शिक्षा पूरी करने के बाद रितु ने बैंकिंग क्षेत्र में अपना करियर बनाया। मेहनत और योग्यता के दम पर वह बैंक में डिप्टी मैनेजर के पद तक पहुंचीं।

यही वजह थी कि परिवार के लिए रितु की घुड़चढ़ी केवल एक नई परंपरा नहीं बल्कि उनकी उपलब्धियों का उत्सव भी थी। परिवार का मानना था कि जब बेटी को पढ़ाने और आगे बढ़ाने में बेटे से कोई भेदभाव नहीं किया गया तो विवाह के समय भी ऐसा अंतर नहीं होना चाहिए।

खास बात: रितु की कहानी में शिक्षा, रोजगार और पारिवारिक सम्मान तीनों पहलू दिखाई देते हैं। परिवार ने उनकी उपलब्धियों को महत्व दिया और शादी की पारंपरिक रस्म में भी उन्हें बराबरी का स्थान दिया।

चाचा ने भतीजी को बेटी की तरह माना

रितु के परिवार की सोच में उनके ताऊ बलवंत प्रधान की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। परिवार के अनुसार बलवंत प्रधान के दो बेटे हैं, जबकि उनके छोटे भाई नरेंद्र यादव के एक बेटा और एक बेटी है।

बलवंत प्रधान ने अपनी भतीजी रितु को हमेशा बेटी जैसा स्नेह दिया। परिवार में पहले ही यह तय कर लिया गया था कि जब रितु की शादी होगी तो उसकी शादी की खुशियां भी उसी तरह मनाई जाएंगी, जैसे बेटे की शादी में मनाई जाती हैं।

यही सोच आगे चलकर घुड़चढ़ी की रस्म में दिखाई दी। परिवार ने वर्षों पुरानी परंपरा को खत्म करने के बजाय उसे नए अर्थ के साथ अपनाया।

पिता सीआरपीएफ में जवान, बेटी ने बनाई अपनी पहचान

रितु के पिता नरेंद्र यादव सीआरपीएफ में जवान हैं। परिवार में अनुशासन, मेहनत और शिक्षा को महत्व दिया जाता रहा। रितु ने भी अपनी पढ़ाई और करियर के माध्यम से परिवार का नाम आगे बढ़ाया।

उनकी कहानी यह दिखाती है कि बेटियों को अवसर मिलने पर वे शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना सकती हैं। हालांकि किसी एक परिवार की पहल को पूरे समाज का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा, लेकिन ऐसी घटनाएं स्थानीय स्तर पर सामाजिक सोच में हो रहे बदलाव की एक झलक जरूर देती हैं।

4 दिसंबर को थी शादी

रितु यादव की शादी से पहले की घुड़चढ़ी
शादी से तीन दिन पहले 1 दिसंबर 2025 को निकाली गई घुड़चढ़ी

रितु यादव की शादी 4 दिसंबर 2025 को गुरुग्राम के एक व्यवसायी के साथ तय थी। शादी से तीन दिन पहले यानी 1 दिसंबर को परिवार ने उनकी घुड़चढ़ी निकाली।

गांव की गलियों से जब रितु घोड़ी पर सवार होकर निकलीं तो यह दृश्य ग्रामीणों के लिए चर्चा का विषय बन गया। पारंपरिक रूप से जिस रस्म को दूल्हे से जोड़ा जाता था, वही रस्म बेटी के लिए निभाई गई।

परिवार की इस पहल का उद्देश्य यह बताना था कि विवाह केवल बेटी को विदा करने का अवसर नहीं है, बल्कि उसके जीवन की नई शुरुआत का उत्सव भी है।

बदलते गांव और बदलती सामाजिक सोच

ग्रामीण समाज में शादी-ब्याह की परंपराओं का अपना विशेष महत्व है। परिवार और समुदाय इन रस्मों के माध्यम से अपनी संस्कृति और सामाजिक संबंधों को आगे बढ़ाते हैं। लेकिन समय के साथ इन परंपराओं के स्वरूप में बदलाव भी देखने को मिल रहा है।

बेटियों की शिक्षा, रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता ने परिवारों की सोच को प्रभावित किया है। आज कई परिवार बेटियों की उपलब्धियों को उसी तरह गर्व के साथ देखते हैं जैसे बेटों की उपलब्धियों को।

रितु की घुड़चढ़ी इसी बदलते नजरिए का एक उदाहरण है। यहां परंपरा को पूरी तरह छोड़ा नहीं गया, बल्कि उसी परंपरा में बेटी की भागीदारी जोड़ दी गई।

सिर्फ घोड़ी पर बैठना नहीं, बराबरी का संदेश

रितु यादव की घुड़चढ़ी की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि यह घटना केवल एक अलग तरह की शादी की रस्म नहीं थी। इसके पीछे परिवार की सोच थी कि बेटी और बेटे के बीच अवसरों और सम्मान में अंतर नहीं होना चाहिए।

बेटी को अच्छी शिक्षा देना, उसे रोजगार के अवसर देना और परिवार की खुशियों में बराबर भागीदार बनाना—ये सभी बातें सामाजिक बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

हालांकि समाज में बदलाव केवल एक रस्म से नहीं आता। इसके लिए शिक्षा, समान अवसर, परिवार का सहयोग और बेटियों के प्रति सम्मान जैसी चीजों की लगातार जरूरत होती है।

इस कहानी की प्रमुख बातें

  • रितु यादव की घुड़चढ़ी 1 दिसंबर 2025 को निकाली गई।
  • यह आयोजन हरियाणा के चोरटापुर बाड़ा गांव में हुआ।
  • परंपरागत रूप से दूल्हे से जुड़ी घुड़चढ़ी बेटी के लिए निकाली गई।
  • रितु ने दिल्ली में स्नातक और एमए की पढ़ाई की।
  • उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र में नौकरी हासिल की और डिप्टी मैनेजर बनीं।
  • उनके पिता नरेंद्र यादव सीआरपीएफ में जवान हैं।
  • उनकी शादी 4 दिसंबर 2025 को गुरुग्राम के एक व्यवसायी के साथ तय थी।
  • परिवार ने बेटी को बेटे के समान सम्मान देने का संदेश दिया।

एक छोटी पहल, बड़ा संदेश

1 दिसंबर 2025 को चोरटापुर बाड़ा में निकली रितु यादव की घुड़चढ़ी अब बीती हुई घटना है, लेकिन परिवार द्वारा दिया गया संदेश आज भी चर्चा योग्य है। इस पहल ने यह सवाल सामने रखा कि क्या परंपराएं केवल एक लिंग तक सीमित रहनी चाहिए या उन्हें बदलते समय के अनुसार नए अर्थ दिए जा सकते हैं?

रितु की कहानी में शिक्षा, नौकरी और पारिवारिक समानता तीनों पहलू एक साथ दिखाई देते हैं। परिवार ने बेटी की उपलब्धियों को सम्मान दिया और विवाह की परंपरा में भी उसे बराबरी का स्थान दिया।

हरियाणा के गांव की यह घटना बताती है कि सामाजिक बदलाव हमेशा बड़े मंचों से नहीं आता। कई बार बदलाव की शुरुआत घर से होती है और फिर वही छोटी-सी पहल समाज में एक नई चर्चा को जन्म देती है।

रितु की घुड़चढ़ी भी ऐसी ही पहल रही, जिसने शादी की एक पारंपरिक रस्म को बेटी के सम्मान और समान अधिकार के संदेश से जोड़ दिया।

स्रोत: उपलब्ध समाचार विवरण एवं दिए गए समाचार फोटो। यह लेख उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।

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