एलएंडटी पर कब्जे की जंग
एलएंडटी पर कब्जे की जंग: धीरूभाई की एंट्री से अनिल-टीना की शादी तक, अंबानी परिवार के हाथ से कैसे निकल गई L&T?
एक ऐसी कॉरपोरेट कहानी जिसमें शेयर बाजार, सरकारी संस्थाएं, अदालत, मीडिया और अंबानी परिवार आमने-सामने दिखाई दिए।
एक तरफ देश की दिग्गज इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन कंपनी L&T थी, तो दूसरी तरफ तेजी से विस्तार कर रहा धीरूभाई अंबानी का रिलायंस समूह। अंबानी परिवार L&T को अपने कारोबारी साम्राज्य का अहम हिस्सा बनाना चाहता था, लेकिन यह कोशिश कई विवादों और संस्थागत टकरावों में उलझ गई।
दिलचस्प बात यह है कि इसी दौर में अनिल अंबानी की शादी फिल्म अभिनेत्री टीना मुनीम से होने वाली थी। यानी एक तरफ परिवार में निजी जिंदगी का बड़ा समारोह था, तो दूसरी तरफ L&T को लेकर बेहद गंभीर कॉरपोरेट संघर्ष चल रहा था।
L&T विवाद सिर्फ शेयर खरीदने तक सीमित नहीं था। इसमें कंपनी का प्रबंधन, सरकारी वित्तीय संस्थाएं, अदालतें, मीडिया और बड़े कारोबारी हित भी शामिल हो गए थे।
1980 के दशक में L&T के भीतर शुरू हुई उथल-पुथल
1986 के आसपास L&T के शीर्ष प्रबंधन में मतभेद और विवाद सामने आने लगे थे। कंपनी के अलग-अलग विभागों से जुड़े मामलों, वित्तीय निर्णयों और प्रबंधन संबंधी मुद्दों ने कंपनी की स्थिति को जटिल बना दिया।
कंपनी की शेयरहोल्डिंग भी काफी बिखरी हुई थी। L&T के पुराने विदेशी प्रमोटर भारत से बाहर जा चुके थे। ऐसे में कंपनी के सामने एक मजबूत कारोबारी समूह के लिए हिस्सेदारी बढ़ाने की संभावना पैदा हुई।
यही वह समय था जब रिलायंस की नजर L&T पर पड़ी।
अंबानी परिवार को L&T में क्या दिखा?
उस समय L&T केवल एक इंजीनियरिंग कंपनी नहीं थी। देश के बड़े औद्योगिक और बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट्स में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। रिलायंस को लगता था कि L&T उसकी औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
- 1988 के आसपास L&T की बिक्री करीब 500 करोड़ रुपये बताई गई।
- 1995 तक कंपनी की बिक्री करीब 3,300 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
- इंजीनियरिंग और औद्योगिक परियोजनाओं में कंपनी की मजबूत स्थिति थी।
- रिलायंस के बढ़ते औद्योगिक विस्तार के लिए L&T रणनीतिक महत्व रखती थी।
मुकेश और अनिल अंबानी की बोर्ड में एंट्री
रिलायंस ने L&T में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी शुरू की। इसके बाद कंपनी के बोर्ड में अंबानी परिवार की मौजूदगी बढ़ने लगी।
मुकेश अंबानी और एम.एल. भक्ता को बोर्ड में शामिल किया गया। इसके कुछ समय बाद अनिल अंबानी भी निदेशक बने।
इसके बाद 28 अप्रैल 1989 को एक बड़ा बदलाव हुआ। L&T के तत्कालीन चेयरमैन एनएम निक्की देसाई के इस्तीफे के बाद धीरूभाई अंबानी L&T के चेयरमैन बन गए।
L&T की कहानी उस दौर की तस्वीर है जब भारत में बड़े औद्योगिक समूह अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर नए क्षेत्रों में विस्तार कर रहे थे।
कॉरपोरेट इतिहास के संदर्भ मेंलेकिन L&T पर नियंत्रण इतना आसान नहीं था
शुरुआत में ऐसा लग सकता था कि अंबानी परिवार ने L&T पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। लेकिन जल्द ही मामला उलझ गया।
L&T के प्रबंधन और अंबानी समूह के बीच मतभेद बढ़ने लगे। कंपनी के पुराने प्रबंधन से जुड़े लोगों और अंबानी समूह के बीच नियंत्रण को लेकर तनाव सामने आया।
इसी बीच L&T के कामकाज और कुछ वित्तीय लेन-देन को लेकर सवाल उठाए गए। पत्रकार एस. गुरुमूर्ति ने L&T में रिलायंस की बढ़ती भूमिका और शेयर खरीद से संबंधित कई सवाल सार्वजनिक रूप से उठाए।
आरोपों में वित्तीय संस्थाओं से शेयरों की खरीद, BoB Fiscal के जरिए हुए लेन-देन और रिलायंस की औद्योगिक परियोजनाओं के लिए L&T की भूमिका जैसे मुद्दे शामिल थे।
इन आरोपों पर अलग-अलग पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें थीं और मामला अदालत तक पहुंच गया।
हजीरा प्रोजेक्ट से जुड़ा विवाद
L&T विवाद को रिलायंस के हजीरा पेट्रोकेमिकल्स प्रोजेक्ट से भी जोड़कर देखा गया।
उस दौर में रिलायंस बड़े पैमाने पर पेट्रोकेमिकल्स कारोबार में विस्तार कर रहा था। L&T की इंजीनियरिंग और वित्तीय क्षमता रिलायंस के लिए उपयोगी हो सकती थी।
आलोचकों ने आरोप लगाया कि L&T से जुड़े कुछ वित्तीय फैसले रिलायंस के विस्तार को लाभ पहुंचाने वाले थे। वहीं अंबानी पक्ष ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया और अपने कारोबार तथा निवेश संबंधी फैसलों का बचाव किया।
विवाद बॉम्बे हाई कोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। इस दौरान L&T का नियंत्रण केवल शेयरों का सवाल नहीं रह गया, बल्कि यह कॉरपोरेट गवर्नेंस और वित्तीय संस्थाओं की भूमिका से जुड़ा बड़ा विवाद बन गया।
धीरूभाई को छोड़नी पड़ी चेयरमैन की कुर्सी
राजनीतिक परिस्थितियां भी बदल रही थीं। 1989 में केंद्र में वी.पी. सिंह की सरकार आई। सरकारी वित्तीय संस्थाओं और L&T के भविष्य को लेकर स्थिति बदलने लगी।
आखिरकार 1990 में धीरूभाई अंबानी ने L&T के चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया। मुकेश और अनिल अंबानी की बोर्ड में मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठते रहे।
इस तरह जिस L&T को रिलायंस अपने औद्योगिक विस्तार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना चाहता था, उसका नियंत्रण अंबानी परिवार के हाथ में स्थायी रूप से नहीं रह सका।
इसी दौर में अनिल अंबानी और टीना मुनीम की शादी
L&T विवाद के इसी दौर में अनिल अंबानी की निजी जिंदगी भी चर्चा में थी। उनका विवाह अभिनेत्री टीना मुनीम से होने वाला था।
कारोबारी संघर्ष और निजी जीवन की यह समानांतर कहानी उस दौर को और दिलचस्प बनाती है। एक तरफ अंबानी परिवार L&T को लेकर बड़े कॉरपोरेट संघर्ष में था, वहीं दूसरी तरफ अनिल अंबानी अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत पड़ाव की ओर बढ़ रहे थे।
यानी परिवार के लिए यह समय कारोबारी और निजी—दोनों स्तरों पर बेहद महत्वपूर्ण था।
1991 के बाद फिर बदला माहौल
1991 में भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों में बड़ा बदलाव आया। पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने और डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री।
नई आर्थिक नीति के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ। निजी क्षेत्र के लिए नए अवसर पैदा होने लगे।
L&T को लेकर अंबानी परिवार की वापसी की कोशिशें भी इसी दौरान फिर तेज हुईं। अगस्त 1991 में प्रस्तावित EGM के जरिए बोर्ड में अंबानी परिवार की भूमिका को लेकर शेयरधारकों का समर्थन जुटाने की कोशिश हुई।
प्रॉक्सी वोटिंग और शेयरधारकों को अपने पक्ष में करने की कवायद शुरू हुई। लेकिन विरोधी पक्ष भी सक्रिय था। बैठक को स्थगित किया गया और विवाद आगे बढ़ता रहा।
घटनाक्रम पर एक नजर
कंपनी के शीर्ष प्रबंधन और कुछ वित्तीय मामलों को लेकर विवाद सामने आने लगे।
बिखरी शेयरहोल्डिंग और कंपनी की रणनीतिक क्षमता ने इसे बड़े कारोबारी समूहों के लिए आकर्षक बनाया।
मुकेश और अनिल अंबानी के बोर्ड में आने के बाद धीरूभाई अंबानी ने कंपनी की चेयरमैनशिप संभाली।
सरकारी और संस्थागत स्तर पर बढ़ते विवादों के बीच धीरूभाई अंबानी ने पद छोड़ दिया।
नरसिम्हा राव सरकार और मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों के बीच L&T को लेकर अंबानी परिवार की वापसी की कोशिशें फिर चर्चा में आईं।
अंबानी परिवार के लिए इतनी अहम क्यों थी L&T?
L&T की कहानी को सिर्फ एक कंपनी के अधिग्रहण की कोशिश के रूप में देखना अधूरा होगा।
यह उस समय की कहानी थी जब भारत में बड़े कारोबारी समूह तेजी से विस्तार कर रहे थे। रिलायंस टेक्सटाइल्स से निकलकर पेट्रोकेमिकल्स और रिफाइनिंग जैसे क्षेत्रों में पहुंच रहा था। दूसरी ओर L&T इंजीनियरिंग, निर्माण और औद्योगिक परियोजनाओं में अपनी मजबूत स्थिति बनाए हुए थी।
इसलिए L&T पर नियंत्रण का मतलब सिर्फ एक कंपनी पर नियंत्रण नहीं था। यह भारत के बदलते औद्योगिक परिदृश्य में रणनीतिक क्षमता हासिल करने की कोशिश भी थी।
रणनीतिक महत्व
L&T की इंजीनियरिंग और प्रोजेक्ट क्षमता बड़े औद्योगिक समूहों के लिए महत्वपूर्ण थी।
रिलायंस का विस्तार
रिलायंस टेक्सटाइल्स से आगे बढ़कर पेट्रोकेमिकल्स और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में विस्तार कर रहा था।
सरकारी संस्थाओं की भूमिका
वित्तीय संस्थाओं और सरकारी तंत्र की भूमिका ने पूरे विवाद को और जटिल बनाया।
कानूनी लड़ाई
विवाद अदालतों तक पहुंचा और L&T का नियंत्रण एक बड़ा सार्वजनिक मुद्दा बन गया।
आखिर अंबानी परिवार के हाथ से कैसे निकल गई L&T?
पूरी कहानी को देखें तो L&T का नियंत्रण अंबानी परिवार के हाथ में स्थायी रूप से इसलिए नहीं रह सका क्योंकि कंपनी की शेयरहोल्डिंग, सरकारी वित्तीय संस्थाओं की भूमिका, बोर्ड नियंत्रण, कानूनी विवाद और बदलता राजनीतिक वातावरण—इन सभी ने मिलकर स्थिति को प्रभावित किया।
धीरूभाई अंबानी L&T के चेयरमैन जरूर बने, लेकिन कुछ ही समय बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद भी अंबानी परिवार की वापसी की कोशिशें जारी रहीं, लेकिन L&T अंततः रिलायंस के स्थायी नियंत्रण में नहीं आई।
यही वजह है कि L&T की यह कहानी भारतीय कॉरपोरेट इतिहास के चर्चित सत्ता संघर्षों में गिनी जाती है।
किसी बड़ी कंपनी में हिस्सेदारी खरीद लेना और उस कंपनी पर स्थायी नियंत्रण हासिल करना दो अलग-अलग बातें हैं। L&T के मामले में शेयर बाजार, बोर्डरूम, सरकारी संस्थाएं, अदालतें और राजनीतिक परिस्थितियां—सभी ने मिलकर अंतिम तस्वीर तय की।
यह लेख उपलब्ध सामग्री तथा गीता पीरामल की पुस्तक ‘बिजनेस महाराजस’ में वर्णित घटनाक्रम के संदर्भ पर आधारित है। विवादित आरोपों और ऐतिहासिक घटनाओं को उनके संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है।
