क्या स्टारडम के पीछे की कहानी सिर्फ बदलते वक्त की थी?
सनी देओल, गोविंदा और बॉबी देओल का दौर: क्या स्टारडम के पीछे की कहानी सिर्फ बदलते वक्त की थी?
80 और 90 के दशक में जिन कलाकारों ने बॉक्स ऑफिस पर अपना दबदबा कायम किया, उनमें सनी देओल, गोविंदा और बाद के दौर में बॉबी देओल प्रमुख नाम रहे। लेकिन इन तीनों के करियर में ऐसे दौर आए, जब लगातार काम मिलने के बाद अचानक फिल्मों की संख्या कम होती चली गई।
बॉबी देओल ने अपने संघर्ष के दौर को याद करते हुए कई इंटरव्यू में अपने करियर के उस कठिन समय के बारे में बात की है। उन्होंने बताया कि एक दौर ऐसा आया जब फिल्म निर्माताओं की दिलचस्पी लगातार कम होने लगी। शुरुआती दौर में जहां निर्माता उनसे संपर्क करते थे, वहीं बाद में निमंत्रण और काम के अवसर कम होते गए।
बॉबी देओल के करियर का संघर्ष यह दिखाता है कि फिल्म इंडस्ट्री में लोकप्रियता हमेशा स्थायी नहीं रहती। एक समय का बड़ा स्टार भी बदलते बाजार और बदलती प्राथमिकताओं के कारण लंबे संघर्ष से गुजर सकता है।
गोविंदा के स्टारडम से संघर्ष तक का सफर
यह अनुभव केवल बॉबी देओल तक सीमित नहीं था। गोविंदा भी अपने करियर के उतार-चढ़ाव पर कई अवसरों पर खुलकर बोल चुके हैं। 90 के दशक में गोविंदा की लोकप्रियता असाधारण थी।
‘आंखें’, ‘राजा बाबू’, ‘कुली नंबर 1’, ‘हीरो नंबर 1’, ‘दुल्हे राजा’ और ‘बड़े मियां छोटे मियां’ जैसी फिल्मों ने उन्हें अलग तरह का सुपरस्टार बनाया। उनकी कॉमिक टाइमिंग, डांस और संवाद अदायगी ने उन्हें उस दौर के सबसे पहचाने जाने वाले सितारों में शामिल किया।
लेकिन 2000 के दशक में उनका करियर कमजोर हुआ। इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं—फिल्मों का चयन, बदलती इंडस्ट्री, काम करने के तरीके में बदलाव और दर्शकों की बदलती पसंद। इन कारणों पर अलग-अलग फिल्मकारों और स्वयं गोविंदा के बयान सामने आते रहे हैं।
- 90 का दशक गोविंदा के सबसे सफल दौरों में शामिल रहा।
- उनकी कॉमेडी और डांस शैली ने उन्हें अलग पहचान दिलाई।
- समय के साथ हिंदी सिनेमा में स्टार सिस्टम और दर्शकों की पसंद बदली।
- 2000 के दशक में उनके करियर की रफ्तार पहले जैसी नहीं रही।
- बाद के वर्षों में उन्होंने अपने करियर के उतार-चढ़ाव पर सार्वजनिक रूप से बात की।
सनी देओल की कहानी कुछ अलग थी
सनी देओल का स्टारडम उनकी एक्शन छवि और दमदार अभिनय पर टिका था। ‘घायल’, ‘दामिनी’, ‘घातक’ और ‘गदर’ जैसी फिल्मों ने उन्हें दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय बनाया।
सनी देओल ने अपने करियर के कठिन दौर और फिल्म इंडस्ट्री में काम करने के अनुभवों को लेकर भी कई बार बातचीत की है। उन्होंने एक पुराने इंटरव्यू में कहा था कि स्थापित अभिनेत्रियां उनके साथ काम करने में रुचि नहीं दिखाती थीं और कई बार उन्हें नई अभिनेत्रियों के साथ काम करना पड़ता था।
यह उनका व्यक्तिगत अनुभव था। हालांकि इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री किसी एक योजना के तहत उनके खिलाफ थी। फिल्म उद्योग में कलाकारों के बीच काम के अवसर कई व्यावसायिक और रचनात्मक कारणों से बदलते रहते हैं।
क्या अंडरवर्ल्ड ने कलाकारों के करियर तय किए?
इस कहानी का सबसे विवादित पहलू फिल्म इंडस्ट्री और अंडरवर्ल्ड के बीच संबंधों से जुड़ा है। 1990 के दशक में मुंबई फिल्म इंडस्ट्री और संगठित अपराध के बीच संबंधों के प्रमाण सामने आए थे।
दाऊद इब्राहिम और डी-कंपनी से जुड़े लोगों पर फिल्म उद्योग में अवैध धन, जबरन वसूली और प्रभाव से जुड़े गंभीर आरोप और आपराधिक मामले सामने आए। उस दौर में फिल्म निर्माताओं और कलाकारों को धमकियों का सामना करने की घटनाएं भी दर्ज हुईं।
किसी दौर में अंडरवर्ल्ड के फिल्म उद्योग से संबंध होने की बात और किसी विशेष अभिनेता को योजनाबद्ध तरीके से बेरोजगार कराने का दावा दो अलग बातें हैं। सनी देओल, गोविंदा या बॉबी देओल को किसी विदेशी एजेंसी द्वारा योजनाबद्ध तरीके से बेरोजगार कराने के दावे को प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के लिए ठोस दस्तावेजी प्रमाण आवश्यक होंगे।
क्या आईएसआई और पाकिस्तानी निवेश का दावा प्रमाणित है?
भारतीय फिल्म उद्योग में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा व्यापक रणनीतिक निवेश, कलाकारों को धर्म के आधार पर निशाना बनाने अथवा पूरी इंडस्ट्री को नियंत्रित करने जैसे दावे भी सार्वजनिक विमर्श में दिखाई देते हैं।
लेकिन ऐसे व्यापक दावों को तथ्य की तरह प्रस्तुत करने के लिए विश्वसनीय दस्तावेजी प्रमाण जरूरी हैं। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि सनी देओल, गोविंदा या अन्य कलाकारों को किसी एक विदेशी संस्था ने योजनाबद्ध तरीके से फिल्म इंडस्ट्री से बाहर किया।
‘गदर’ के बाद सनी देओल की छवि
‘गदर: एक प्रेम कथा’ ने भारत-पाकिस्तान विभाजन और भारत-पाकिस्तान संबंधों की पृष्ठभूमि में सनी देओल की एक बेहद शक्तिशाली राष्ट्रवादी एक्शन-हीरो छवि बनाई।
फिल्म की लोकप्रियता और उसके संवादों ने भारत के साथ-साथ सीमा पार भी चर्चा पैदा की। हालांकि पाकिस्तान में सनी देओल के प्रति प्रतिक्रिया को सीधे किसी संगठित अंतरराष्ट्रीय साजिश से जोड़ना प्रमाण के बिना उचित नहीं होगा।
सलमान खान का उदय और एक्शन सिनेमा
90 के दशक के मध्य और उसके बाद सलमान खान का एक्शन स्टार के रूप में तेजी से उभरना हिंदी सिनेमा के बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा था। इसी दौर में अक्षय कुमार, अजय देवगन, संजय दत्त और सुनील शेट्टी जैसे कलाकार भी एक्शन फिल्मों में मजबूत पहचान बना रहे थे।
इसे केवल इस रूप में देखना कि किसी एक अभिनेता की सफलता दूसरे अभिनेता की बेरोजगारी का कारण बनी, फिल्म बाजार की जटिलता को बहुत सरल बना देगा। बॉक्स ऑफिस में दर्शकों की पसंद, स्क्रिप्ट, स्टार फीस, निर्माता की आर्थिक गणना, प्रचार और रिलीज डेट जैसे अनेक कारक काम करते हैं।
फिल्म इंडस्ट्री में स्टारडम एक स्थिर संपत्ति नहीं है। समय, दर्शक, बाजार, कहानी और नए कलाकार—सभी मिलकर किसी अभिनेता की लोकप्रियता की दिशा बदल सकते हैं।
बहिष्कार की राजनीति या दर्शकों की पसंद?
हाल के वर्षों में फिल्मों के बहिष्कार और सोशल मीडिया अभियानों ने मनोरंजन उद्योग को प्रभावित किया है। ‘लाल सिंह चड्ढा’ के समय भी सोशल मीडिया पर व्यापक विरोध और बहिष्कार अभियान देखने को मिला था।
लेकिन किसी फिल्म के प्रदर्शन को केवल एक ऑनलाइन अभियान से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं बताता। फिल्म की कहानी, समीक्षाएं, प्रचार, रिलीज का समय, प्रतियोगी फिल्में और दर्शकों की वास्तविक प्रतिक्रिया सभी मिलकर बॉक्स ऑफिस परिणाम को प्रभावित करते हैं।
इसलिए किसी फिल्म या पूरे सिनेमा के बहिष्कार की अपील को समाचार लेख में तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि संबंधित व्यक्ति या समूह की राय के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है।
असली सवाल क्या है?
सनी देओल, गोविंदा और बॉबी देओल की कहानियां एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर उठाती हैं—क्या फिल्म इंडस्ट्री में लोकप्रियता हमेशा स्थायी होती है?
जवाब शायद नहीं है। स्टारडम समय के साथ बदलता है। कभी एक अभिनेता के नाम पर फिल्म बिकती है, फिर वही अभिनेता निर्माता के लिए जोखिम बन सकता है। नई पीढ़ी आती है, नए विषय आते हैं, दर्शकों की प्राथमिकताएं बदलती हैं और मार्केटिंग का तरीका भी बदल जाता है।
बॉबी देओल और सनी देओल की वापसी
बॉबी देओल का करियर इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है। एक समय वे काम के लिए संघर्ष कर रहे थे, लेकिन बाद में ‘आश्रम’ और ‘एनिमल’ जैसे प्रोजेक्ट्स ने उनके करियर को नई दिशा दी।
सनी देओल ने भी लंबे अंतराल के बाद ‘गदर 2’ के जरिए जबरदस्त वापसी की। फिल्म की सफलता ने यह दिखाया कि किसी अभिनेता के करियर में लंबा अंतराल उसकी लोकप्रियता का अंतिम अध्याय जरूरी नहीं होता।
सनी देओल, गोविंदा और बॉबी देओल के करियर को केवल एक साजिश की कहानी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। उनके सफर में व्यक्तिगत संघर्ष, फिल्म चयन, बदलते बाजार, नए सितारों का उदय, दर्शकों की बदलती पसंद और इंडस्ट्री के बदलते कामकाज जैसे अनेक पहलू शामिल हैं।
वहीं 1990 के दशक में फिल्म उद्योग पर अंडरवर्ल्ड के प्रभाव का इतिहास भी वास्तविक और गंभीर विषय है। लेकिन ऐतिहासिक घटनाओं और अपुष्ट आरोपों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
अंततः इन तीनों कलाकारों की यात्रा यह बताती है कि सिनेमा में स्टारडम का रास्ता हमेशा सीधा नहीं होता। लोकप्रियता आती है, बदलती है, कभी खत्म होती हुई दिखाई देती है और कई बार वर्षों बाद फिर उसी ताकत के साथ लौट आती है।
सनी देओल, गोविंदा और बॉबी देओल की कहानी सिर्फ संघर्ष की कहानी नहीं है। यह बदलते बॉलीवुड, बदलते दर्शकों और स्टारडम के बदलते अर्थ की कहानी भी है।
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