दक्षिण की राजनीति में सत्ता संघर्ष: बगावत, समझौता और नेतृत्व की जंग

दक्षिण भारत की राजनीति इन दिनों बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। तमिलनाडु और कर्नाटक में जो घटनाक्रम सामने आ रहे हैं, वे केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह पूरे देश की राजनीति को प्रभावित करने वाले संकेत दे रहे हैं। तमिलनाडु में जहां पार्टी के भीतर बगावत और फिर सुलह का नाटक देखने को मिला, वहीं कर्नाटक में कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन को लेकर खींचतान चरम पर पहुंचती दिख रही है। इन दोनों घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय राजनीति में सबसे बड़ी चुनौती अब विपक्ष से ज्यादा अपनी ही पार्टी के भीतर संतुलन बनाए रखने की हो गई है।

तमिलनाडु में बगावत और वापसी का राजनीतिक ड्रामा
तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से व्यक्तित्व आधारित रही है। जयललिता और करुणानिधि के दौर के बाद अब क्षेत्रीय दलों में नेतृत्व को लेकर लगातार संघर्ष देखने को मिलता रहा है। हाल के घटनाक्रम में ई. पलानीस्वामी के नेतृत्व वाली पार्टी में पैदा हुआ संकट भी इसी राजनीतिक अस्थिरता का उदाहरण है।शुक्रवार को दोनों गुटों ने विधानसभा स्पीकर से मुलाकात कर यह भरोसा दिलाया कि पार्टी अब एकजुट है। बागी विधायकों ने पार्टी के प्रति दोबारा निष्ठा जताते हुए कहा कि वे हमेशा एकजुट रहेंगे। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ दिन पहले तक यही विधायक पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोले हुए थे।

पलानीस्वामी ने वापस ली अयोग्यता की मांग
फ्लोर टेस्ट के दौरान पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर 25 विधायकों ने विजय सरकार के समर्थन में मतदान किया था। इसके बाद ई. पलानीस्वामी ने स्पीकर को पत्र लिखकर इन विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की थी। राजनीतिक गलियारों में इसे पार्टी अनुशासन को बचाने की कोशिश माना गया।लेकिन अब जब बागी विधायक दोबारा पार्टी खेमे में लौट आए हैं, तब पलानीस्वामी ने अपनी अयोग्यता वाली याचिका वापस ले ली। यह कदम केवल राजनीतिक समझौता नहीं बल्कि अपनी नेतृत्व क्षमता दिखाने का प्रयास भी माना जा रहा है। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी में अंतिम निर्णय लेने की ताकत अभी भी उन्हीं के पास है।

चुनावी हार के बाद शुरू हुई थी बगावत
दरअसल यह पूरा संकट चुनावी हार के बाद शुरू हुआ था। सीवी शन्मुगम के नेतृत्व में कुछ विधायकों ने पलानीस्वामी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। बागी गुट विजय सरकार को समर्थन देना चाहता था, लेकिन पलानीस्वामी इस प्रस्ताव के खिलाफ थे।इसके बावजूद 25 विधायक पार्टी व्हिप के खिलाफ जाकर सरकार के पक्ष में वोटिंग कर बैठे। यह केवल अनुशासनहीनता नहीं थी, बल्कि नेतृत्व को खुली चुनौती थी। भारतीय राजनीति में फ्लोर टेस्ट के दौरान पार्टी लाइन से हटकर मतदान करना किसी भी दल के लिए गंभीर संकट माना जाता है।
बागी गुट को लगा बड़ा झटका
राजनीतिक समीकरण तब बदल गए जब बागी गुट के चार विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा देकर दूसरे खेमे का दामन थाम लिया। यह बागियों के लिए बड़ा झटका था क्योंकि उनकी संख्या लगातार कम होने लगी।स्पीकर कार्यालय में उनकी अयोग्यता को लेकर कार्रवाई लंबित थी। ऐसे में पलानीस्वामी ने इन इस्तीफों पर भी आपत्ति जताई और कहा कि पहले अयोग्यता प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए। इससे साफ था कि वह किसी भी कीमत पर पार्टी पर अपनी पकड़ कमजोर नहीं होने देना चाहते।

छह विधायक लौटे पार्टी खेमे में
एंटी-डिफेक्शन कानून की कार्रवाई से बचने के लिए छह विधायकों ने दोबारा पार्टी में वापसी कर ली। उन्होंने स्पीकर और पार्टी नेतृत्व को माफीनामा सौंपा तथा फ्लोर टेस्ट के दौरान पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने पर खेद जताया।यह वापसी केवल कानूनी दबाव का परिणाम नहीं थी, बल्कि राजनीतिक भविष्य बचाने की रणनीति भी थी। भारतीय राजनीति में बगावत करने वाले नेताओं के सामने सबसे बड़ा खतरा राजनीतिक अलगाव का होता है। शायद यही कारण था कि कई विधायक अंततः समझौते के रास्ते पर लौट आए।

पलानीस्वामी की स्थिति हुई मजबूत
बागी गुट की संख्या 25 से घटकर 15 रह जाने के बाद पार्टी में सुलह की कोशिशें तेज हो गईं। इससे ई. पलानीस्वामी की स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत हो गई है।बागी नेताओं के प्रतिनिधिमंडल ने एसपी वेलुमणि के नेतृत्व में पलानीस्वामी से उनके आवास पर मुलाकात की और विवाद खत्म करने का ऐलान किया। नेताओं ने स्पष्ट कहा कि पलानीस्वामी ही उनके नेता हैं और अब सभी मतभेद समाप्त हो चुके हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि पलानीस्वामी अभी भी पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेता बने हुए हैं। 

कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व संकट

तमिलनाडु के बाद अब कर्नाटक कांग्रेस भी भीतरी संघर्ष से जूझ रही है। मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के बीच नेतृत्व को लेकर लंबे समय से खींचतान चल रही है। अब खबरें हैं कि कांग्रेस हाईकमान नेतृत्व परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ रहा है।लेकिन सियासत यहां भी इतनी आसान नहीं है। सत्ता छोड़ने से पहले सिद्दारमैया खेमे ने ऐसी शर्तें रख दी हैं, जिन्होंने डीके शिवकुमार की राह को और कठिन बना दिया है।

कई डिप्टी सीएम बनाने की मांग
सूत्रों के अनुसार सिद्दारमैया गुट ने साफ कर दिया है कि यदि डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाता है, तो सरकार में कई डिप्टी सीएम बनाए जाएं।राजनीतिक जानकार इसे डीके शिवकुमार की ताकत सीमित करने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं। यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि नेतृत्व परिवर्तन का मतलब सत्ता का पूरा हस्तांतरण नहीं होगा।दरअसल सिद्दारमैया केवल मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि कर्नाटक कांग्रेस के सबसे बड़े जनाधार वाले नेताओं में से एक हैं। पिछड़े वर्गों और खासकर कुरुबा समुदाय में उनकी मजबूत पकड़ है।

कांग्रेस अध्यक्ष पद पर भी नजर
सिद्दारमैया गुट केवल सरकार तक सीमित नहीं रहना चाहता। खबरें हैं कि कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष पद पर भी अपनी पसंद का नेता बैठाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं।वरिष्ठ नेता सतीश जारकीहोली का नाम इसी रणनीति के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है। अनुसूचित जनजाति समुदाय से आने वाले जारकीहोली को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश कर सकती है।इससे एक ओर सिद्दारमैया खेमे को संतुष्ट किया जा सकेगा, वहीं दूसरी ओर पार्टी को सामाजिक संतुलन का फायदा भी मिलेगा।

क्या स्थिर रह पाएगी ऐसी सरकार?
यदि डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनते हैं और साथ ही कई डिप्टी सीएम बनाए जाते हैं, तो सरकार के भीतर शक्ति संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि जहां कई शक्ति केंद्र बनते हैं, वहां अंतर्विरोध भी तेजी से बढ़ते हैं। कांग्रेस पहले भी पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में आंतरिक संघर्ष का नुकसान उठा चुकी है।कर्नाटक में भी यदि सिद्दारमैया और डीके शिवकुमार समर्थकों के बीच खींचतान जारी रहती है, तो सरकार की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

सिद्दारमैया को दिल्ली भेजने की तैयारी
कांग्रेस हाईकमान अब सिद्दारमैया को सम्मानजनक विदाई देने की रणनीति पर काम कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्हें राज्यसभा भेजकर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका देने का प्रस्ताव दिया गया है।।हालांकि सिद्दारमैया ने अभी इस प्रस्ताव पर अंतिम सहमति नहीं दी है। उन्होंने अपने करीबी नेताओं से लंबी चर्चा की है और संकेत दिया है कि वह हाईकमान के फैसले का सम्मान करेंगे, लेकिन उनका खेमा यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उनकी राजनीतिक ताकत कमजोर न पड़े।

कांग्रेस के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने की है। पार्टी डीके शिवकुमार को लंबे इंतजार के बाद मुख्यमंत्री बनाकर संतुष्ट करना चाहती है, लेकिन वह सिद्दारमैया जैसे बड़े जनाधार वाले नेता को नाराज करने का जोखिम भी नहीं उठा सकती।इसी कारण पार्टी अब पावर शेयरिंग मॉडल पर काम करती दिख रही है। हाल ही में हुई लंबी बैठकों को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।अब कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल और कर्नाटक प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला के बेंगलुरु दौरे पर सबकी नजरें टिकी हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में नेतृत्व संकट पर अंतिम फैसला हो सकता है।
तमिलनाडु और कर्नाटक की राजनीति इस समय भारतीय लोकतंत्र के भीतर चल रही उस बड़ी लड़ाई का प्रतीक बन चुकी है, जहां सत्ता से ज्यादा महत्वपूर्ण नियंत्रण और नेतृत्व बन गया है।तमिलनाडु में पलानीस्वामी ने यह साबित कर दिया कि मजबूत नेतृत्व अब भी बगावत को नियंत्रित कर सकता है। वहीं कर्नाटक कांग्रेस में यह साफ दिखाई दे रहा है कि सत्ता परिवर्तन केवल चेहरा बदलने भर का मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन और शक्ति साझेदारी का जटिल खेल है।आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस कई शक्ति केंद्रों के साथ स्थिर सरकार चला पाएगी, और क्या दक्षिण भारत की राजनीति में यह नेतृत्व संघर्ष नए राजनीतिक समीकरणों को जन्म देगा। फिलहाल इतना तय है कि दक्षिण की राजनीति आने वाले महीनों में पूरे देश की नजरों का केंद्र बनी रहेगी।