एक गुमनाम प्रचारक जिसने बदल दी पश्चिम बंगाल की राजनीतिक धारा
रामचंद्र पांडेय और बंगाल में भाजपा-
संघ के विस्तार की कहानीभारत की राजनीति में अक्सर वही चेहरे चर्चा में रहते हैं, जो मंचों पर दिखाई देते हैं। चुनावी सभाओं में भाषण देने वाले नेता और मीडिया की सुर्खियों में रहने वाले चेहरे ही आम जनता तक पहुंचते हैं। हालांकि, हर बड़ी राजनीतिक सफलता के पीछे कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो पर्दे के पीछे रहकर संगठन और विचारधारा की मजबूत नींव तैयार करते हैं।पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के उभार के पीछे भी एक ऐसा ही नाम माना जाता है — रामचंद्र पांडेय। आम जनता के बीच यह नाम भले कम चर्चित हो, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में उन्हें एक प्रभावशाली रणनीतिकार माना जाता है। बंगाल में भाजपा के विस्तार और संघ के प्रति सकारात्मक वातावरण बनाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण बताई जाती है।
प्रणब मुखर्जी का नागपुर दौरा और बदलता बंगाल
साल 2018 में भारतीय राजनीति में एक ऐसी घटना हुई, जिसने बंगाल की वैचारिक राजनीति को प्रभावित किया। भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय के कार्यक्रम में भाग लिया।कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और बंगाल के प्रतिष्ठित “भद्रलोक” चेहरे का संघ के मंच पर जाना उस समय राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया था। कहा जाता है कि इस संवाद को संभव बनाने में रामचंद्र पांडेय की महत्वपूर्ण भूमिका रही।उन्होंने अपने संपर्क, संवाद क्षमता और संगठनात्मक कौशल के माध्यम से ऐसा माहौल तैयार किया, जिससे यह ऐतिहासिक मुलाकात संभव हो सकी। इसके बाद बंगाल के शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग में संघ और भाजपा को लेकर दृष्टिकोण बदलना शुरू हुआ। पहली बार समाज के एक बड़े वर्ग ने संघ को नए नजरिए से देखना आरंभ किया।
2016 के बाद बंगाल में संघ की नई रणनीति
2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद संघ ने राज्य में संगठन विस्तार की नई रणनीति तैयार की। इसी दौरान रामचंद्र पांडेय को कोलकाता केंद्रित जिम्मेदारी सौंपी गई।उनका उद्देश्य केवल संगठन बढ़ाना नहीं था। वे बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय राष्ट्रवादी सोच वाले लोगों को एक सूत्र में जोड़ना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने लगातार प्रवास किया और कई जिलों में संपर्क अभियान चलाया।सिलीगुड़ी, बर्दवान, आसनसोल, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे क्षेत्रों में बैठकों का सिलसिला शुरू हुआ। कोलकाता की गलियों से लेकर छोटे कस्बों तक पुराने भाजपा कार्यकर्ताओं, संघ स्वयंसेवकों और विभिन्न दलों से निराश लोगों के साथ संवाद स्थापित किया गया।यहीं उनकी सबसे बड़ी विशेषता सामने आई। उन्होंने राजनीति को केवल चुनावी गणित नहीं माना, बल्कि सामाजिक विश्वास निर्माण का माध्यम बनाया।
सुवेंदु अधिकारी और संगठन विस्तार की रणनीति
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सुवेंदु अधिकारी का भाजपा में आना एक बड़ा राजनीतिक मोड़ माना जाता है। इसके पीछे लंबे समय तक संवाद और रणनीतिक प्रयास हुए।सूत्रों के अनुसार, रामचंद्र पांडेय ने ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं से संपर्क बनाए, जो राज्य में राजनीतिक परिवर्तन चाहते थे। हालांकि, उन्होंने केवल बड़े नेताओं पर ध्यान केंद्रित नहीं किया। इसके बजाय बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने पर जोर दिया।इसी रणनीति का परिणाम था कि भाजपा ने बंगाल में तेजी से अपना जनाधार बढ़ाया और राज्य की मुख्य विपक्षी शक्ति बनकर उभरी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सफलता केवल चुनावी नारों की वजह से नहीं थी। इसके पीछे वर्षों तक चला वैचारिक संपर्क और संगठनात्मक धैर्य भी था।
साधारण जीवन, असाधारण कार्य
रामचंद्र पांडेय का जीवन संघ के पारंपरिक प्रचारकों की सादगी का उदाहरण माना जाता है। बताया जाता है कि वे आज भी बेहद साधारण जीवन जीते हैं।दो जोड़ी कपड़े, साधारण चप्पल और लगातार प्रवास — यही उनकी पहचान रही है। उन्होंने अपना पूरा जीवन संगठन कार्य को समर्पित कर दिया।जिस दौर में नरेंद्र मोदी ने प्रचारक जीवन की शुरुआत की, लगभग उसी समय रामचंद्र पांडेय ने भी उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ स्थित अपने गांव को छोड़कर संघ कार्य को जीवन का उद्देश्य बना लिया।प्रोफेसर रज्जू भैया के संपर्क में आने के बाद वे पूरी तरह संगठन कार्य में सक्रिय हो गए। पूर्वी उत्तर प्रदेश, अवध, काशी और बुंदेलखंड में उन्होंने दशकों तक संगठन विस्तार का कार्य किया।
राजनाथ सिंह को संगठन से जोड़ने की कहानी
कम लोग जानते हैं कि वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को संगठनात्मक रूप से सक्रिय करने में भी रामचंद्र पांडेय की भूमिका बताई जाती है।कहा जाता है कि मिर्जापुर में उन्हें आरएसएस का जिला कार्यवाह बनाकर संगठन की मुख्यधारा से जोड़ने में पांडेय जी का महत्वपूर्ण योगदान था।उत्तर प्रदेश में भाजपा और संघ के कई बड़े संगठनकर्ताओं को उनका प्रशिक्षित कार्यकर्ता माना जाता है। उन्होंने हमेशा युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने पर बल दिया।
बंगाल में जमीनी संपर्क की ताकत
पिछले एक दशक के दौरान रामचंद्र पांडेय ने पश्चिम बंगाल में लगातार प्रवास किया। कहा जाता है कि कोलकाता का शायद ही कोई ऐसा इलाका हो, जहां उन्होंने बैठक न की हो।उन्होंने पुराने भाजपा कार्यकर्ताओं और संघ स्वयंसेवकों के घरों तक पहुंचकर संवाद स्थापित किया। इसके साथ ही युवा प्रचारकों की एक टीम भी लगातार सक्रिय रही।संघ की घोषवादक टीम के राष्ट्रीय मार्गदर्शक के रूप में भी उनकी अलग पहचान बताई जाती है। आज राजनीति में प्रचार और मीडिया प्रबंधन को सफलता का आधार माना जाता है। हालांकि, बंगाल में भाजपा के विस्तार ने यह साबित किया कि जमीनी संपर्क, वैचारिक संवाद और संगठनात्मक धैर्य भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
टिकट वितरण और युवा नेतृत्व पर जोर
सूत्रों के अनुसार, भाजपा में उम्मीदवार चयन और टिकट वितरण को लेकर भी रामचंद्र पांडेय ने महत्वपूर्ण सुझाव दिए।उन्होंने ऐसे युवाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया, जिनकी जमीनी पकड़ मजबूत थी। साथ ही, उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व तक सही सूचनाएं पहुंचाने का कार्य भी किया।इसी कारण भाजपा अपेक्षाकृत कम समय में बंगाल की राजनीति में मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित हो सकी।
गुमनाम रहकर भी प्रभावशाली
रामचंद्र पांडेय उन प्रचारकों में गिने जाते हैं, जिन्होंने कभी प्रसिद्धि की इच्छा नहीं रखी। वे आज भी सामान्य कार्यकर्ता की तरह जीवन जीते हैं।न मीडिया में चर्चा, न सार्वजनिक मंचों पर प्रचार — फिर भी संगठन के भीतर उनकी भूमिका प्रभावशाली मानी जाती है।बंगाल में भाजपा की मजबूती केवल चुनावी रणनीति का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे वर्षों का संगठनात्मक श्रम, वैचारिक विस्तार और समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद शामिल था।इस पूरी प्रक्रिया में रामचंद्र पांडेय जैसे प्रचारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पश्चिम बंगाल में भाजपा के उभार की कहानी
पश्चिम बंगाल में भाजपा के उभार की कहानी केवल चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह उन गुमनाम कार्यकर्ताओं की कहानी भी है, जिन्होंने बिना किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के वर्षों तक संगठन को मजबूत किया।रामचंद्र पांडेय का जीवन यह दिखाता है कि राजनीति में वास्तविक परिवर्तन केवल भाषणों से नहीं आता। इसके लिए समाज के बीच निरंतर संवाद, विश्वास निर्माण और समर्पित संगठनात्मक कार्य की आवश्यकता होती है।आज भले ही उनका नाम आम जनता के बीच बहुत अधिक प्रसिद्ध न हो, लेकिन बंगाल में भाजपा और संघ के विस्तार की कहानी लिखी जाएगी तो उनका उल्लेख एक ऐसे रणनीतिकार के रूप में अवश्य होगा, जिसने शांत रहकर राजनीतिक इतिहास की दिशा बदलने में योगदान दिया।
लेखक : निर्देशक अरुण पाण्डेय
