उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी फैक्टर

UP BJP LEADER

भारतीय राजनीति में उत्तर प्रदेश हमेशा से सत्ता का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता अक्सर लखनऊ से होकर गुजरता है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति केवल प्रदेश तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसका सीधा असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ता है। भारतीय जनता पार्टी के इतिहास में भी उत्तर प्रदेश का योगदान सबसे महत्वपूर्ण रहा है। जब अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री थे, तब भाजपा एक ऐसी पार्टी के रूप में दिखाई देती थी जिसमें कई बड़े नेता समानांतर रूप से सक्रिय रहते थे और सभी को सम्मान मिलता था। उस दौर में प्रदेश में कई ऐसे चेहरे थे जिनकी अपनी अलग पहचान थी और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता भी थी।

उस समय उत्तर प्रदेश में केसरी नाथ त्रिपाठी, कलराज मिश्र, राजनाथ सिंह, लालजी टंडन, ओमप्रकाश सिंह और कल्याण सिंह जैसे नेता पार्टी की रीढ़ माने जाते थे। हर नेता की अपनी राजनीतिक ताकत थी। पार्टी में विचार-विमर्श होता था, संगठन मजबूत था और सबसे बड़ी बात यह थी कि भाजपा को किसी जाति विशेष की पार्टी नहीं माना जाता था। पार्टी में ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, पिछड़े और दलित समाज के नेताओं को भी स्थान मिलता था। इसी कारण भाजपा का जनाधार लगातार बढ़ता गया।

कल्याण सिंह के समय भाजपा ने उत्तर प्रदेश में एक बड़ा सामाजिक आधार खड़ा किया। राम मंदिर आंदोलन के कारण हिंदुत्व की राजनीति मजबूत हुई, लेकिन उसके साथ-साथ संगठनात्मक संतुलन भी बना रहा। किसी भी समाज को यह महसूस नहीं हुआ कि भाजपा किसी एक वर्ग की पार्टी बनती जा रही है। यही कारण था कि उस दौर में पार्टी के भीतर विरोध की राजनीति कम दिखाई देती थी।

इसके बाद रामप्रकाश गुप्ता मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल भले बहुत लंबा नहीं रहा, लेकिन संगठन और सरकार के बीच संतुलन बना रहा। फिर राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बने। राजनाथ सिंह को संगठन और प्रशासन दोनों का अनुभव था। उनके समय में भी भाजपा के कई नेता सक्रिय रहे और प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव बना रहा। भाजपा उस समय सामूहिक नेतृत्व वाली पार्टी के रूप में देखी जाती थी।

लेकिन परिस्थितियां पूरी तरह तब बदलीं जब योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। योगी का व्यक्तित्व अन्य नेताओं से बिल्कुल अलग था। वे केवल एक राजनेता नहीं बल्कि एक धार्मिक और वैचारिक छवि वाले नेता के रूप में सामने आए। जनता के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। खासकर हिंदुत्व समर्थक वर्ग में योगी की छवि एक मजबूत प्रशासक और निर्णायक नेता की बनी।

यहीं से उत्तर प्रदेश भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन बदलने लगा। ऐसा माना जाने लगा कि केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश में किसी भी अन्य बड़े भाजपा नेता को उभरने का अवसर नहीं दिया। जो नेता आगे बढ़े भी, वे अधिकतर दूसरे दलों से आए हुए थे। उदाहरण के तौर पर मनोज पांडे, जो अब मंत्री बने हैं, वे समाजवादी पार्टी से भाजपा में आए। इसी तरह बृजेश पाठक, जो आज उपमुख्यमंत्री हैं, वे कभी बहुजन समाज पार्टी और मायावती के करीबी माने जाते थे।

इसके अलावा भी भाजपा सरकार में कई ऐसे चेहरे महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचे जो मूल रूप से भाजपा की पुरानी विचारधारा और संगठन से जुड़े हुए नहीं थे। सवाल यह उठता है कि आखिर भाजपा के पुराने नेताओं को क्यों पीछे किया गया? क्या यह केवल राजनीतिक रणनीति थी या फिर केंद्र नेतृत्व नहीं चाहता था कि उत्तर प्रदेश में कोई और बड़ा जनाधार वाला नेता तैयार हो?

यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि भाजपा का संगठन हमेशा कैडर आधारित राजनीति की बात करता रहा है। पार्टी का कार्यकर्ता वर्षों तक मेहनत करता है इस उम्मीद में कि संगठन उसके समर्पण का सम्मान करेगा। लेकिन जब बाहर से आए नेताओं को बड़े पद मिलने लगे और पुराने कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज किया जाने लगा, तब असंतोष बढ़ना स्वाभाविक था।

लोकसभा चुनाव के परिणामों ने भी कहीं न कहीं इसी असंतोष की झलक दिखाई। भाजपा को उत्तर प्रदेश में उम्मीद के अनुसार सफलता नहीं मिली। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच जो दूरी बढ़ी, उसका नुकसान पार्टी को चुनाव में उठाना पड़ा। जनता के बीच यह संदेश गया कि प्रदेश भाजपा में अब केवल कुछ चुनिंदा लोगों की ही चलती है।

आज के हालात में योगी आदित्यनाथ के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल विपक्ष नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर भी कई प्रकार की राजनीतिक खींचतान है। राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि केंद्र सरकार के कुछ नेता योगी की बढ़ती लोकप्रियता से असहज महसूस करते हैं। कई मंत्री और नेता ऐसे बताए जाते हैं जो चाहते हैं कि योगी को मुख्यमंत्री पद से हटाया जाए या उनकी राजनीतिक ताकत को सीमित किया जाए।

जब 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की ऐतिहासिक जीत हुई थी, तब मुख्यमंत्री पद के लिए मनोज सिन्हा का नाम सबसे आगे माना जा रहा था। लेकिन अचानक योगी आदित्यनाथ के नाम की घोषणा हुई और पूरा राजनीतिक समीकरण बदल गया। योगी का मुख्यमंत्री बनना भाजपा की राजनीति में एक बड़ा मोड़ था। इसके बाद उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई।आज स्थिति यह है कि योगी को केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नेता नहीं माना जाता। देश के कई हिस्सों में भाजपा समर्थकों के बीच उन्हें भविष्य के राष्ट्रीय नेता के रूप में देखा जाने लगा है। यही कारण है कि समय-समय पर उनके और केंद्र नेतृत्व के बीच मतभेदों की खबरें भी सामने आती रहती हैं।

योगी की कार्यशैली भी अन्य नेताओं से अलग मानी जाती है। वे प्रशासनिक मामलों में सीधे हस्तक्षेप करने वाले नेता के रूप में देखे जाते हैं। कानून व्यवस्था पर उनकी सख्ती और नौकरशाही पर नियंत्रण की शैली ने उन्हें अलग पहचान दी। यही कारण है कि उनके समर्थक उन्हें एक मजबूत नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं।लेकिन दूसरी ओर आलोचक यह भी कहते हैं कि भाजपा के भीतर सामूहिक नेतृत्व की परंपरा कमजोर हुई है। जो नेता संगठन में वर्षों से काम कर रहे थे, वे धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए। इससे पार्टी के भीतर एक प्रकार का असंतुलन पैदा हुआ।आज उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि भाजपा की असली ताकत योगी आदित्यनाथ हैं। ठीक उसी तरह जैसे एक समय कल्याण सिंह भाजपा की सबसे बड़ी ताकत माने जाते थे।

कल्याण सिंह के बिना भाजपा की कल्पना कठिन लगती थी, उसी तरह आज कई भाजपा समर्थक मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में योगी के बिना पार्टी कमजोर पड़ सकती है।विधानसभा चुनाव को लेकर भी राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा अगर सत्ता में लौटती है तो उसका सबसे बड़ा कारण योगी की लोकप्रियता होगी। जनता के बीच उनकी व्यक्तिगत छवि अभी भी मजबूत मानी जाती है। लेकिन लोकसभा चुनावों में स्थिति अलग हो सकती है। वहां जनता राष्ट्रीय नेतृत्व को ध्यान में रखकर मतदान करती है और इसी कारण भाजपा के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं।

केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश नेतृत्व के बीच तालमेल की चर्चा भी लगातार होती रहती है। कई बार ऐसा देखा गया कि प्रदेश में किसी विवाद या राजनीतिक तनाव के बाद प्रधानमंत्री को स्वयं लखनऊ आकर स्थिति संभालनी पड़ी। इससे यह संदेश भी जाता है कि भाजपा के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है।राजनीति में शक्ति संतुलन हमेशा बदलता रहता है। आज जो नेता शीर्ष पर होता है, कल उसकी स्थिति बदल सकती है। यही कारण है कि भाजपा के भीतर भी आने वाले वर्षों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। यदि पार्टी अपने पुराने कार्यकर्ताओं और क्षेत्रीय नेताओं की अनदेखी करती रही तो उसका असर भविष्य के चुनावों पर पड़ सकता है।

मध्य प्रदेश में मोहन यादव और बिहार में सम्राट चौधरी जैसे नेताओं के बयानों को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा के भीतर नई पीढ़ी के नेता अपनी अलग पहचान बनाना चाहते हैं। इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी दिखाई दे सकता है।उत्तर प्रदेश की जनता हमेशा से राजनीतिक रूप से जागरूक रही है। यहां के मतदाता केवल नारों से प्रभावित नहीं होते, बल्कि नेतृत्व, संगठन और सामाजिक संतुलन को भी देखते हैं। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में छोटे बदलाव भी बड़े परिणाम लेकर आते हैं।

आने वाले समय में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह संगठनात्मक संतुलन कैसे बनाए रखती है। यदि पार्टी केवल कुछ चेहरों पर निर्भर रहती है और पुराने नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को महत्व नहीं देती, तो उसका नुकसान हो सकता है। दूसरी ओर यदि भाजपा योगी की लोकप्रियता और संगठन की ताकत के बीच संतुलन बना लेती है, तो वह लंबे समय तक उत्तर प्रदेश में मजबूत बनी रह सकती है।फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति अब केवल सत्ता की राजनीति नहीं रह गई है। यह नेतृत्व, महत्वाकांक्षा, संगठन और जनाधार की लड़ाई बन चुकी है। योगी आदित्यनाथ इस लड़ाई के केंद्र में हैं और आने वाले वर्षों में उनकी भूमिका भारतीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

वारदात डेस्क