क्षेत्रीय दलों की कमजोरी से किसे होगा फायदा?

क्षेत्रीय दलों की कमजोरी से किसे होगा फायदा

                                                                                                          कांग्रेस की वापसी या भाजपा की बढ़त
भारतीय राजनीति में एक बार फिर क्षेत्रीय दलों के भविष्य को लेकर बहस तेज हो गई है। देश के कई राज्यों में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के भीतर असंतोष, नेतृत्व संकट और टूट-फूट की घटनाएं सामने आ रही हैं। महाराष्ट्र में एनसीपी और शिवसेना के विभाजन से लेकर विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों के अंदर बढ़ती गुटबाजी ने राजनीतिक विश्लेषकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति का स्वरूप क्या होगा। बड़ा सवाल यह है कि यदि क्षेत्रीय दल कमजोर पड़ते हैं तो उसका सबसे बड़ा लाभ किसे मिलेगा—कांग्रेस को या भाजपा को?

क्षेत्रीय दलों की कमजोरी से किसे होगा फायदा

भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका
पिछले तीन दशकों में क्षेत्रीय दल भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ियों में शामिल रहे हैं। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, अन्नाद्रमुक, बीजद, टीआरएस (अब बीआरएस), शिवसेना और एनसीपी जैसे दलों ने न केवल अपने-अपने राज्यों में मजबूत राजनीतिक आधार बनाया बल्कि केंद्र की सरकारों के गठन और गिराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।1990 के दशक के बाद गठबंधन राजनीति के दौर में क्षेत्रीय दलों की ताकत लगातार बढ़ी। कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को भी सरकार बनाने के लिए इन दलों का सहयोग लेना पड़ा। लेकिन अब परिस्थितियां बदलती दिखाई दे रही हैं।

क्यों कमजोर पड़ रहे हैं क्षेत्रीय दल?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश क्षेत्रीय दल नेतृत्व-केंद्रित राजनीति पर आधारित रहे हैं। इन दलों का संगठन अक्सर एक परिवार या एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। जब नेतृत्व में मतभेद या उत्तराधिकार का संकट पैदा होता है तो दलों के भीतर बगावत की स्थिति बन जाती है।महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी इसका बड़ा उदाहरण हैं। इसी तरह कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष देखने को मिला है। इसके अलावा भाजपा के लगातार विस्तार और कांग्रेस की नई रणनीतियों ने भी क्षेत्रीय दलों पर दबाव बढ़ाया है।

क्षेत्रीय दलों की कमजोरी से किसे होगा फायदा

क्या कांग्रेस को मिलेगा फायदा?
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय दलों का जनाधार कमजोर होता है तो कांग्रेस को इसका लाभ मिल सकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि देश के अधिकांश क्षेत्रीय दल कभी न कभी कांग्रेस से अलग होकर बने थे। समय के साथ उन्होंने कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक अपने पक्ष में कर लिया और कई राज्यों में कांग्रेस को हाशिए पर पहुंचा दिया।अब यदि इन दलों की पकड़ कमजोर होती है तो उनके वोटरों का एक हिस्सा फिर से कांग्रेस की ओर लौट सकता है।
हाल के वर्षों में इसके कुछ उदाहरण भी देखने को मिले हैं।तेलंगाना में बीआरएस की कमजोरी का फायदा कांग्रेस को मिला और पार्टी सत्ता में वापस आई। कर्नाटक में जेडीएस का प्रभाव घटने के साथ कांग्रेस ने मजबूत प्रदर्शन किया। इसी प्रकार केरल में वामपंथी दलों के खिलाफ बढ़ते असंतोष का राजनीतिक लाभ भी कांग्रेस को मिलता दिखाई दिया।वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री सहित कई विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय दलों की कमजोरी कांग्रेस को राष्ट्रीय विपक्ष के रूप में स्थापित करने का अवसर दे सकती है। हालांकि यह पूरी तरह राज्यों की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
भाजपा को भी हो सकता है लाभ
हालांकि यह मान लेना गलत होगा कि क्षेत्रीय दलों के कमजोर होने का फायदा केवल कांग्रेस को ही मिलेगा। पिछले एक दशक में भाजपा ने कई राज्यों में अपने संगठन का विस्तार किया है और वहां अपनी राजनीतिक उपस्थिति मजबूत की है।पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तेलंगाना और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में भाजपा लगातार अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में यदि क्षेत्रीय दलों का वोट बैंक टूटता है तो उसका एक हिस्सा भाजपा की ओर भी जा सकता है।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जहां कांग्रेस मजबूत संगठनात्मक स्थिति में नहीं है, वहां क्षेत्रीय दलों के कमजोर होने का सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। यही कारण है कि भाजपा क्षेत्रीय दलों की चुनौतियों को अपने विस्तार के अवसर के रूप में देख रही है।

कांग्रेस की चुनौती केवल क्षेत्रीय दल नहीं
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह केवल दूसरे दलों की कमजोरी के भरोसे अपनी राजनीतिक ताकत नहीं बढ़ा सकती। पार्टी को अपने संगठन को मजबूत करना होगा, राज्यों में नेतृत्व विकसित करना होगा और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना होगा।कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक का कहना है कि हर राजनीतिक दल पहले खुद को मजबूत करने की कोशिश करता है और कांग्रेस भी यही कर रही है। उनका दावा है कि कांग्रेस सहयोगियों के साथ सम्मानजनक संबंध बनाए रखने में विश्वास करती है और भाजपा की तरह दबाव की राजनीति नहीं करती।हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि कांग्रेस को अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए लंबा संघर्ष करना होगा। केवल क्षेत्रीय दलों के कमजोर होने से पार्टी अपने पुराने गौरव को हासिल नहीं कर सकती।
विपक्षी एकता का सवाल
लोकसभा चुनावों के बाद भी विपक्षी राजनीति में एकता बनाए रखने की कोशिशें जारी हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच तालमेल के संकेत मिल रहे हैं। इससे साफ है कि क्षेत्रीय दल अभी भी विपक्षी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।कई राज्यों में कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का संबंध प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों का मिश्रण है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि क्षेत्रीय दल पूरी तरह अप्रासंगिक हो गए हैं
कांग्रेस का बदला हुआ रुख
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस अब उन दलों के प्रति अपेक्षाकृत नरम रवैया अपनाती दिखाई दे रही है जो कभी उससे अलग होकर बने थे। पार्टी नेतृत्व समझता है कि राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा का मुकाबला करने के लिए व्यापक विपक्षी एकता जरूरी है।इसी संदर्भ में कांग्रेस संगठन महासचिव के हालिया बयान को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने कहा कि कांग्रेस छोड़कर गए दल यदि वापस आना चाहते हैं या विलय करना चाहते हैं तो उनका स्वागत किया जाएगा। इस बयान को कांग्रेस की बदली हुई राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

क्षेत्रीय दलों की कमजोरी भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत हो सकती है, लेकिन इसका सीधा लाभ किसे मिलेगा, इसका उत्तर इतना आसान नहीं है। कुछ राज्यों में कांग्रेस को फायदा मिल सकता है, तो कई जगह भाजपा अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है। वहीं अनेक क्षेत्रीय दल अभी भी अपने राज्यों में मजबूत जनाधार रखते हैं और निकट भविष्य में उनकी भूमिका समाप्त होती नहीं दिखती।स्पष्ट है कि कांग्रेस की मजबूती केवल क्षेत्रीय दलों की कमजोरी पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि उसके संगठन, नेतृत्व, रणनीति और जनता के बीच विश्वास कायम करने की क्षमता पर तय होगी। वहीं भाजपा भी इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य का लाभ उठाने की कोशिश करेगी। आने वाले विधानसभा चुनाव और भविष्य के लोकसभा चुनाव इस बात का फैसला करेंगे कि भारतीय राजनीति का अगला केंद्र कांग्रेस बनेगी, भाजपा का वर्चस्व और बढ़ेगा या फिर क्षेत्रीय दल नए रूप में वापसी करेंगे।