भारतीय संविधान, : क्या सच में सभी नागरिक बराबर हैं?

भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। यहां का संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार देने की बात करता है। संविधान की प्रस्तावना में “समानता”, “न्याय” और “स्वतंत्रता” जैसे शब्दों को विशेष महत्व दिया गया है। अनुच्छेद 14 स्पष्ट रूप से कहता है कि भारत में सभी नागरिक कानून की नजर में समान हैं। लेकिन दूसरी ओर यही संविधान जातिगत आरक्षण की व्यवस्था भी करता है, अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रावधान देता है और बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक जैसी परिभाषाओं को भी स्वीकार करता है। यही कारण है कि समय-समय पर यह प्रश्न उठता है कि यदि सभी नागरिक समान हैं, तो फिर अलग-अलग वर्गों के लिए अलग नियम क्यों बनाए गए?

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आज देश में यह बहस केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि समाज के हर वर्ग में इस पर चर्चा हो रही है। विशेष रूप से जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चैधरी जैसे नेता सामाजिक असमानता और जातिगत राजनीति पर बयान देते हैं, तब यह बहस और तेज हो जाती है।भारतीय संविधान के निर्माताओं ने देश की सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कई विशेष व्यवस्थाएं की थीं। संविधान निर्माण के समय भारत सदियों की जातिगत विषमता, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव से जूझ रहा था। दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान से वंचित रखा गया था। इसी कारण संविधान निर्माता B. R. Ambedkar ने आरक्षण को एक अस्थायी व्यवस्था के रूप में लागू किया, ताकि समाज के पिछड़े वर्ग मुख्यधारा में आ सकें।

डॉ. अंबेडकर का उद्देश्य समाज को स्थायी रूप से जातियों में बांटना नहीं था, बल्कि उन वर्गों को अवसर देना था जो सदियों से वंचित थे। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था राजनीतिक हथियार बनती चली गई। कांग्रेस ने इसे लंबे समय तक आगे बढ़ाया और बाद में अन्य दलों ने भी वोट बैंक की राजनीति के कारण इसे जारी रखा। आज स्थिति यह है कि आरक्षण केवल सामाजिक न्याय का विषय नहीं रह गया, बल्कि राजनीतिक समीकरणों का सबसे बड़ा आधार बन चुका है।संविधान कहता है कि सभी नागरिक समान हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि आज भी समाज जातियों में बंटा हुआ दिखाई देता है। चुनाव आते ही राजनीतिक दल जातिगत समीकरणों के आधार पर उम्मीदवार तय करते हैं। समाज को दलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा, सवर्ण और अल्पसंख्यक जैसे वर्गों में बांटकर राजनीति की जाती है। यही कारण है कि कई लोग यह सवाल उठाते हैं कि यदि संविधान वास्तव में सभी को समान मानता है, तो फिर यह विभाजन क्यों?

धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा भी इसी बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, प्रचार करने और पालन करने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन दूसरी ओर अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार भी प्रदान करता है। अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को विशेष संरक्षण दिया गया है। सरकार कई योजनाओं में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए अलग प्रावधान करती है। ऐसे में बहुसंख्यक समाज के कुछ वर्ग यह महसूस करते हैं कि समानता का सिद्धांत व्यवहार में पूरी तरह लागू नहीं हो पा रहा।

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भारत को “सेक्युलर” राष्ट्र कहा जाता है। सेक्युलर का अर्थ है कि राज्य सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार करेगा। लेकिन भारतीय राजनीति में धर्म और जाति दोनों हमेशा प्रभावी रहे हैं। चुनावों में धार्मिक ध्रुवीकरण और जातिगत समीकरण खुले तौर पर दिखाई देते हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत वास्तव में पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष है, या फिर धर्मनिरपेक्षता केवल संविधान की पुस्तकों तक सीमित रह गई है?कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि प्रकृति ने ही मनुष्यों में विविधता बनाई है। कोई आर्थिक रूप से मजबूत है, कोई कमजोर; कोई शिक्षित है, कोई अशिक्षित; कोई सामाजिक रूप से प्रभावशाली है, तो कोई वंचित। ऐसे में पूर्ण समानता केवल एक आदर्श हो सकती है, वास्तविकता नहीं। शायद इसी कारण संविधान ने समानता के साथ-साथ “विशेष अवसर” की व्यवस्था भी बनाई।

लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि लंबे समय तक चलने वाली आरक्षण व्यवस्था ने समाज में नई प्रकार की असमानताएं भी पैदा की हैं। कई प्रतिभाशाली युवाओं को यह महसूस होता है कि अवसर जाति के आधार पर बांटे जा रहे हैं। वहीं आरक्षित वर्ग के लोग इसे अपना संवैधानिक अधिकार मानते हैं। यही टकराव आज देश की सामाजिक और राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा विषय बन चुका है।आज आवश्यकता इस बात की है कि देश में सामाजिक न्याय और समानता के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। आरक्षण का उद्देश्य समाज को बराबरी पर लाना था, लेकिन यदि यह व्यवस्था स्थायी राजनीतिक हथियार बन जाए तो इससे सामाजिक विभाजन और गहरा हो सकता है। इसलिए समय-समय पर इसकी समीक्षा होना भी आवश्यक माना जाता है।

भारत का संविधान एक जीवंत दस्तावेज है। समय के साथ इसमें कई संशोधन हुए हैं और आगे भी होते रहेंगे। संविधान का मूल उद्देश्य देश को एकजुट रखना और प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन देना है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में समानता और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन बनाना आसान कार्य नहीं है।अंततः यह प्रश्न केवल संविधान का नहीं, बल्कि समाज की सोच का भी है। जब तक समाज जाति और धर्म के आधार पर स्वयं को अलग-अलग वर्गों में बांटता रहेगा, तब तक राजनीतिक दल भी उसी आधार पर राजनीति करते रहेंगे। वास्तविक समानता तब आएगी जब नागरिक स्वयं को पहले भारतीय मानेंगे और उसके बाद जाति या धर्म के आधार पर अपनी पहचान तय करेंगे।भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि यहां हर विचार पर खुलकर चर्चा हो सकती है। संविधान पर प्रश्न उठाना भी लोकतंत्र का हिस्सा है और उसका सम्मान करना भी। लेकिन किसी भी बहस का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि उसे बेहतर दिशा देना होना चाहिए।
                                                                                                                                                                                                        लेखक: संजय विनायक जोशी
                                                                                                                                                                                               विचारक | लेखक | समाज विश्लेषक
                                                                                                                                                                                   वेबसाइट: www.sanjayvinayakjoshi.com