बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट के काले कारनामे
शिक्षा व्यवस्था, नियुक्तियों और बढ़ते सवालों का सच
बिहार एक ऐसा प्रदेश है जिसकी पहचान कभी ज्ञान, शिक्षा और विद्वता के केंद्र के रूप में होती थी। नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने दुनिया को ज्ञान का प्रकाश दिया था। लेकिन आज वही बिहार अपनी शिक्षा व्यवस्था, नियुक्तियों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में खड़ा दिखाई देता है। हाल के दिनों में विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में हुई कुछ नियुक्तियों ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या बिहार में प्रतिभा से अधिक प्रभाव और पहुंच का महत्व बढ़ता जा रहा है?पटना के प्रतिष्ठित ए.एन. कॉलेज में बिहार के मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत की पत्नी प्रोफेसर रत्ना अमृत को प्राचार्य बनाए जाने तथा कॉलेज ऑफ कॉमर्स में एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की पत्नी को प्राचार्य बनाए जाने की चर्चाएं राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में तेजी से फैल रही हैं। इसके साथ ही विभिन्न आयोगों, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों में प्रभावशाली लोगों के परिवार के सदस्यों की नियुक्तियों को लेकर भी प्रश्न उठाए जा रहे हैं।
क्या बिहार में आम लोगों के लिए जगह बची है?
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति को केवल उसके पारिवारिक संबंधों के आधार पर गलत नहीं कहा जा सकता। यदि किसी उम्मीदवार के पास आवश्यक योग्यता, अनुभव और नियमों के अनुसार चयन की पात्रता है तो उसे अवसर मिलना चाहिए। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब लगातार ऐसी नियुक्तियों का एक पैटर्न दिखाई देने लगता है और आम जनता के मन में यह धारणा बनने लगती है कि महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचने के लिए प्रतिभा से अधिक प्रभावशाली परिवार से जुड़ाव आवश्यक है।बिहार में पिछले कुछ वर्षों के दौरान विभिन्न आयोगों, बोर्डों और विश्वविद्यालयों में हुई नियुक्तियों को लेकर कई बार सवाल उठे हैं। सहायक प्रोफेसरों की बहाली से लेकर विभिन्न प्रशासनिक पदों तक, ऐसे अनेक उदाहरण सामने आए जिनमें राजनीतिक नेताओं, वरिष्ठ अधिकारियों या प्रभावशाली व्यक्तियों के परिवार के सदस्यों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं। इन घटनाओं ने युवाओं के बीच यह संदेश पहुंचाया कि प्रतिस्पर्धा और मेहनत के बावजूद अवसरों का वितरण पूरी तरह निष्पक्ष नहीं है।
रोजगार व शिक्षा के संकट से जूझता बिहार
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि बिहार का युवा पहले से ही रोजगार और शिक्षा के संकट से जूझ रहा है। लाखों छात्र बेहतर शिक्षा और रोजगार के लिए हर वर्ष दूसरे राज्यों की ओर पलायन करते हैं। दिल्ली, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोटा जैसे शहरों में बिहार के विद्यार्थियों की बड़ी संख्या दिखाई देती है। इसका कारण केवल रोजगार नहीं बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की तलाश भी है।ऐसे समय में यदि उच्च शिक्षा संस्थानों में होने वाली नियुक्तियों को लेकर विवाद पैदा होता है, तो इसका सीधा असर युवाओं के मनोबल पर पड़ता है। उन्हें लगने लगता है कि उनकी मेहनत, योग्यता और संघर्ष का मूल्य कम होता जा रहा है। यह भावना किसी भी समाज के लिए खतरनाक होती है क्योंकि इससे व्यवस्था के प्रति विश्वास कमजोर पड़ता है।लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है। यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि अवसर केवल कुछ चुनिंदा परिवारों तक सीमित हैं, तो सामाजिक असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि सरकारों और प्रशासनिक संस्थाओं की जिम्मेदारी केवल निष्पक्ष कार्य करना ही नहीं, बल्कि निष्पक्षता दिखाई भी देनी चाहिए।
बिहार में शिक्षा का वास्तविक स्वरूप
आज बिहार में यह सवाल केवल किसी एक कॉलेज या एक नियुक्ति का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या राज्य की शिक्षा व्यवस्था वास्तव में प्रतिभा को आगे बढ़ाने का माध्यम बन रही है या फिर प्रभावशाली वर्गों के लिए अवसरों का सुरक्षित क्षेत्र बनती जा रही है? यदि योग्य और प्रतिभाशाली युवाओं को लगातार यह महसूस होगा कि व्यवस्था उनके लिए नहीं है, तो बिहार का भविष्य और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।मुख्यमंत्री और सरकार के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि वे इन सवालों का जवाब दें। यदि सभी नियुक्तियां नियमों के अनुसार हुई हैं तो उनकी प्रक्रिया को पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक किया जाना चाहिए। चयन के मानदंड, अनुभव, योग्यता और मेरिट की जानकारी सामने आने से लोगों के मन में पैदा हो रही शंकाएं दूर हो सकती हैं। पारदर्शिता ही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे मजबूत हथियार होती है।बिहार की राजनीति में अक्सर जाति, धर्म, अगड़ा-पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा होती है। लेकिन इन सबसे बड़ा मुद्दा शिक्षा और अवसरों की समानता का है। यदि एक गरीब किसान, मजदूर, शिक्षक या छोटे व्यापारी का बेटा-बेटी यह महसूस करे कि उसकी मेहनत के आधार पर उसे आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा, तभी समाज में वास्तविक समानता स्थापित हो सकती है।
बिहार में युवाओं का भरोसा
आज बिहार को नई सड़कों, पुलों और भवनों के साथ-साथ एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है जो युवाओं को भरोसा दे सके। केवल डिग्री बांटने से राज्य का विकास नहीं होगा। विकास तब होगा जब विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र बनेंगे, नियुक्तियां पारदर्शी होंगी और प्रतिभा को सम्मान मिलेगा।बिहार का इतिहास गौरवशाली रहा है। इस भूमि ने चाणक्य, आर्यभट्ट और अनेक महान विद्वानों को जन्म दिया है। इसलिए बिहार के लोगों की अपेक्षाएं भी स्वाभाविक रूप से बड़ी हैं। वे चाहते हैं कि राज्य फिर से शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान स्थापित करे। लेकिन यह तभी संभव है जब शिक्षा संस्थानों में विश्वास, गुणवत्ता और निष्पक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।अंततः सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या बिहार का आम युवा अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त है? क्या उसे लगता है कि उसकी मेहनत उसे सफलता तक पहुंचा सकती है? यदि इस प्रश्न का उत्तर "नहीं" है, तो यह किसी भी सरकार और समाज के लिए गंभीर चेतावनी है।बिहार को आज राजनीतिक नारों से अधिक शिक्षा सुधार की आवश्यकता है। पारदर्शी नियुक्तियां, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और समान अवसर ही वह रास्ता है जो राज्य को फिर से ज्ञान और विकास की दिशा में आगे बढ़ा सकता है। अन्यथा यह आशंका बनी रहेगी कि सत्ता, प्रभाव और परिवारवाद के बीच आम जनता के सपने कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं।
