एवरेस्ट के ग्लेशियर पर इंसानी गतिविधियों का असर,

एवरेस्ट के ग्लेशियर पर इंसानी गतिविधियों का असर,

एवरेस्ट के ग्लेशियर पर इंसानी गतिविधियों का असर, पेशाब की गर्मी से पिघल रही बर्फ का भी अध्ययन
हिमालय • पर्यावरण • जलवायु परिवर्तन • विशेष रिपोर्ट
पर्यावरण | विशेष रिपोर्ट

एवरेस्ट के ग्लेशियर पर इंसानी गतिविधियों का असर, पेशाब की गर्मी से पिघल रही बर्फ का भी अध्ययन

ग्लोबल वॉर्मिंग के बीच माउंट एवरेस्ट के खुम्बु ग्लेशियर पर बढ़ती मानवीय गतिविधियों को लेकर वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।

हिमालय में बढ़ती बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच माउंट एवरेस्ट से जुड़ी एक स्टडी ने ग्लेशियरों पर इंसानी गतिविधियों के एक ऐसे पहलू की ओर ध्यान खींचा है, जिस पर आमतौर पर चर्चा कम होती है।
6,766 लीटर अनुमानित दैनिक पेशाब
1,600 लगभग टेंट
154 टन अनुमानित बर्फ पिघलने का योगदान
0.28°C वार्षिक तापमान वृद्धि का अनुमान

नई दिल्ली। हिमालय में हाल के वर्षों में बढ़ती बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ और ग्लेशियरों की स्थिति लगातार बदल रही है।

इसी बीच माउंट एवरेस्ट से जुड़ी एक स्टडी ने ग्लेशियरों पर इंसानी गतिविधियों के एक ऐसे पहलू की ओर ध्यान खींचा है, जिसके बारे में आम तौर पर चर्चा नहीं होती।

रिसर्च के मुताबिक, ग्लोबल वॉर्मिंग और जीवाश्म ईंधन से पैदा होने वाली गर्मी हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की सबसे बड़ी वजह हैं, लेकिन एवरेस्ट जैसे अत्यधिक व्यस्त पर्वतीय क्षेत्रों में इंसानी गतिविधियां भी स्थानीय स्तर पर तापमान को प्रभावित कर सकती हैं।

एवरेस्ट बेस कैंप में हर दिन हजारों लीटर पेशाब

एवरेस्ट पर चढ़ाई का मौसम शुरू होते ही बेस कैंप में लोगों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से पर्वतारोही यहां पहुंचते हैं। उनके साथ शेरपा, गाइड, रसोइये, पोर्टर और अन्य कर्मचारी भी कई सप्ताह तक कैंप में रहते हैं।

नेपाली और अमेरिकी वैज्ञानिकों की स्टडी में अनुमान लगाया गया कि 2023 के क्लाइंबिंग सीजन के दौरान एवरेस्ट बेस कैंप में प्रतिदिन करीब 6,766 लीटर पेशाब पैदा हो सकता है।

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बेस कैंप खुम्बु ग्लेशियर के ऊपर स्थित है। ऊंचाई वाले इलाकों में शरीर को पर्याप्त हाइड्रेटेड रखने के लिए पर्वतारोहियों को सामान्य से अधिक पानी पीना पड़ता है। इसका स्वाभाविक परिणाम अधिक पेशाब के रूप में सामने आता है।

📌 महत्वपूर्ण तथ्य

वैज्ञानिकों ने इंसानी पेशाब को ग्लेशियर पिघलने की मुख्य वजह नहीं बताया है। इसका अध्ययन स्थानीय तापीय प्रभाव और मानवीय गतिविधियों के व्यापक पर्यावरणीय असर को समझने के संदर्भ में किया गया है।

1,600 टेंट और बढ़ती मानवीय गतिविधियां

एवरेस्ट बेस कैंप अब केवल कुछ पर्वतारोहियों का अस्थायी पड़ाव नहीं रह गया है। चढ़ाई के मौसम में यहां करीब 1,600 टेंट लगाए जाने का अनुमान है। इन टेंटों में रहने, खाना बनाने और अन्य आवश्यकताओं के लिए कई तरह की सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं।

किचन, शॉवर, जनरेटर, बिजली, संचार व्यवस्था और वाई-फाई जैसी सुविधाओं के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है। इन सभी गतिविधियों से स्थानीय वातावरण में गर्मी पैदा होती है।

ग्लेशियर के ऊपर इतने बड़े स्तर पर मानवीय गतिविधियां होने के कारण वैज्ञानिक यह समझना चाहते हैं कि स्थानीय स्तर पर इसका बर्फ पर कितना प्रभाव पड़ता है।

37 डिग्री तापमान से निकलता है पेशाब

मानव शरीर से बाहर निकलते समय पेशाब का तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्सियस हो सकता है। इसी कारण वैज्ञानिकों ने यह सवाल उठाया कि इतनी बड़ी मात्रा में गर्म तरल के ग्लेशियर के बेहद ठंडे वातावरण में पहुंचने से स्थानीय बर्फ पर कितना असर पड़ सकता है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। शरीर से निकलने के बाद पेशाब लंबे समय तक 37 डिग्री पर नहीं रहता। आसपास का बेहद ठंडा वातावरण इसे तेजी से ठंडा कर देता है। इसका एक बड़ा हिस्सा अपनी गर्मी हवा, जमीन और आसपास की चट्टानों में खो देता है।

⚠️ मुख्य बात

पेशाब से निकलने वाली गर्मी ग्लेशियर पिघलने की सबसे बड़ी वजह नहीं है। हिमालय में बढ़ता तापमान और ग्लोबल वॉर्मिंग कहीं अधिक महत्वपूर्ण कारक हैं।

फिर भी, वैज्ञानिकों ने उपलब्ध आंकड़ों और तापीय प्रभाव के आधार पर अनुमान लगाया कि एक पूरे क्लाइंबिंग सीजन में इस गर्मी के कारण ग्लेशियर की करीब 154 टन बर्फ पिघलने में योगदान हो सकता है।

यह आंकड़ा सुनने में बड़ा लग सकता है, लेकिन पूरे ग्लेशियर के संदर्भ में यह अपेक्षाकृत छोटा प्रभाव है। इसका महत्व इस बात में है कि यह दिखाता है कि अत्यधिक संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय मानवीय गतिविधियां भी पर्यावरणीय बदलावों में योगदान दे सकती हैं।

“एवरेस्ट की चुनौती सिर्फ पर्वतारोहण की नहीं, बल्कि बदलते हिमालय और उसके पर्यावरण की भी है।” — पर्यावरणीय अध्ययन से जुड़ा व्यापक संदेश

असली खतरा ग्लोबल वॉर्मिंग

वैज्ञानिकों के मुताबिक, एवरेस्ट के ग्लेशियरों के सामने सबसे बड़ा खतरा इंसानी पेशाब नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ता वैश्विक तापमान है। हिमालय में तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार भी बढ़ी है।

रिपोर्ट के अनुसार, साल 2000 के बाद हिमालयी क्षेत्र में बर्फ पिघलने की रफ्तार पिछली अवधि की तुलना में लगभग दोगुनी हुई है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्वतीय पारिस्थितिकी में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।

एवरेस्ट बेस कैंप की सतह का तापमान भी खुम्बु ग्लेशियर के दूसरे हिस्सों की तुलना में तेजी से बढ़ने का अनुमान लगाया गया है। अध्ययन में इसके बढ़ने की दर करीब 0.28 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष बताई गई है।

हिमालय का बढ़ता तापमान सबसे बड़ी चिंता

हिमालयी ग्लेशियर केवल बर्फ के विशाल भंडार नहीं हैं। वे करोड़ों लोगों के लिए जल व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ग्लेशियरों में होने वाले बदलावों का असर भविष्य में नदियों के प्रवाह, पानी की उपलब्धता, पहाड़ी पारिस्थितिकी और आपदा जोखिमों पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि तापमान बढ़ने की मौजूदा रफ्तार जारी रही तो आने वाले वर्षों में हिमालयी ग्लेशियरों की स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है।

भविष्य के लिए बड़ा संकेत

एवरेस्ट पर इंसानी गतिविधियों और ग्लेशियरों के बीच संबंध का यह अध्ययन एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है। अगर दुनिया के सबसे ऊंचे और दुर्गम क्षेत्रों में भी मानव गतिविधियों का स्थानीय पर्यावरण पर असर दिखाई देने लगा है, तो बढ़ते पर्यटन और पर्वतारोहण को किस तरह अधिक टिकाऊ बनाया जाए?

एवरेस्ट की स्टडी का संदेश केवल यह नहीं है कि इंसानी पेशाब से कुछ बर्फ पिघल सकती है। बड़ा संदेश यह है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में हिमालय जैसे नाजुक क्षेत्रों में हर मानवीय गतिविधि के पर्यावरणीय प्रभाव को समझना जरूरी है।

ग्लोबल वॉर्मिंग को नियंत्रित करना इस चुनौती का सबसे महत्वपूर्ण समाधान है। साथ ही पर्वतारोहण और पर्यटन को पर्यावरण के अनुकूल बनाकर हिमालयी ग्लेशियरों पर पड़ने वाले अतिरिक्त स्थानीय दबाव को भी कम किया जा सकता है।

Please follow and like us:
Pin Share

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *