बई के ब्यूटी पार्लर और स्पा सेंटरों की आड़ में हुस्न का ऐसा खतरनाक जाल बुना जा रहा था कि बड़े-बड़े अधिकारी और अमीर लोग भी उसमें फंसकर बर्बाद हो गए. इसी जंजाल में फंस गए थे वाल्टरगंज थाने के एसएचओ (SHO) सूर्य प्रकाश सिंह, जिन्होंने हनी ट्रैप और ब्लैकमेलिंग के इस खौफनाक जाल से तंग आकर अपने ही सरकारी आवास में फंदे से लटककर आत्महत्या कर ली.मरने से पहले उन्होंने अपने व्हाट्सएप स्टेटस पर लिखा था कि 'दौलत और जायदाद जरूरी हैं, लेकिन सुकून और प्यार से बढ़कर कुछ नहीं.' अब इस मामले की तहकीकात करते हुए बस्ती पुलिस ने प्रियंका चौधरी नाम की महिला को गिरफ्तार किया है जो स्पा और ब्यूटीपार्लर की आड़ में जिस्मफरोशी का धंधा चली रही थी. उसका शिकार थे बड़े अधिकारी और अमीर लोग और उसके काले धंधे में पार्टनर कोई और नहीं बल्कि प्रियंका के अपने पिता रामनयन सिंह और वकील विजय प्रकाश यादव थे. जांच में खुलासा हुआ है कि यह शातिर गैंग अब तक कई अमीर लोगों और एक डॉक्टर को ब्लैकमेल कर लाखों-करोड़ों रुपए ऐंठ चुका था, और एसएचओ सूर्य प्रकाश सिंह इस हनी ट्रैप का चौथा शिकार बने थे.ब्यूटी पार्लर और स्पा की आड़ में बिछाती थी हुस्न का जालपुलिस की पूछताछ और सर्विलांस रिपोर्ट से पता चला कि 32 साल की प्रियंका चौधरी पिछले 10 साल से अपने पति से अलग रह रही थी और मुंबई के अलग-अलग ब्यूटी पार्लर व स्पा सेंटरों में काम करती थी. इसी आड़ में वह रईस लोगों और अधिकारियों को अपने प्रेमजाल में फंसाती थी. वह व्हाट्सएप और वीडियो कॉल के जरिए लोगों से नजदीकियां बढ़ाती और फिर उनकी प्राइवेट चैट्स और वीडियो रिकॉर्ड कर लेती थी. उसी वीडियो को वायरल करने की धमकी देकर लोगों से पैसों की डिमांड करती थी.हाथ की नस काटने का नाटक कर ऐसे डराती थी शातिर हसीनादैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रियंका का ब्लैकमेलिंग का तरीका इतना खतरनाक था कि अच्छे-अच्छे लोगों के पसीने छूट जाते थे. वह वीडियो कॉल पर ही अपने हाथ की नस काटने का ड्रामा करती थी और स्क्रीन पर खून बहता हुआ दिखाकर सामने वाले को मौत का खौफ पैदा कर देती थी. लोग डर के मारे पुलिस के पास जाने की बजाय उसकी मांगें पूरी करने लगते थे. इस गंदे खेल में उसका पूरा साथ उसका पिता रामनयन चौधरी और एक वकील विजय प्रकाश देता था. वकील साहब का काम पीड़ितों से एक्सटॉर्शन के पैसे वसूलना और ठिकाने लगाना था. पुलिस ने इन तीनों के पास से एक बोलेरो कार और तीन मोबाइल फोन भी बरामद किए हैं.1 करोड़ की रंगदारी से टूट गए थे एसएचओ सूर्य प्रकाशवाल्टरगंज थाने के एसएचओ सूर्य प्रकाश सिंह भी इसी जाल में फंस गए थे. प्रियंका और सूर्य प्रकाश एक ही इलाके में रहने के कारण संपर्क में आए. दोनों के बीच व्यक्तिगत संबंध विकसित हुए. इसी दौरान प्रियंका आपत्तिजनक कंटेंट रिकॉर्ड किया और 1 करोड़ रुपये की भारी-भरकम रकम की डिमांड की और विरोध करने पर ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया. घटना वाले दिन यानी 29 अगस्त को दोपहर 1:41 बजे उसके वकील विजय प्रकाश ने एसएचओ से फोन पर बात की और पैसों के लिए दबाव बनाया. रिटायरमेंट में सिर्फ चार साल बचे होने और इतनी बड़ी रकम का इंतजाम न कर पाने के कारण सूर्य प्रकाश भयंकर तनावग्रस्त हो गए और अंत में अपनी जान दे दी.पुलिस ने यूं किया गैंग का पर्दाफाश, हिस्ट्री शीटर निकली महिलाएसएचओ सूर्य प्रकाश सिंह के परिवार वाले सदमे में हैं. पुलिस अधिकारियों से कड़ी कार्रवाई की मांग की जा रही है. स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने बताया कि तकनीकी साक्ष्यों, कॉल डिटेल्स और सर्विलांस के आधार पर तीनों आरोपियों को सदर अस्पताल के पास से धर दबोचा. पुलिस अब यह खंगालने में जुटी है कि इस गैंग ने और कितने रईस लोगों को अपना शिकार बनाया है. यह घटना हर उस इंसान के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो आसानी से किसी के प्रेमजाल में फंस जाते हैं.- UP Crime: जन्मोत्सव की रात 'राधा' बनकर मंदिर जा रही थी नाबालिग, रास्ते में आ गए 3 दरिंदे… सुनसान घर में खींचकर किया घिनौना कांड!

फुरसतगंज का खामोश कातिल

फुरसतगंज का खामोश कातिल: दो साल तक पुलिस को चकमा देता रहा सीरियल किलर
🔴 रहस्य और अपराध की कहानी

फुरसतगंज का खामोश कातिल: दो साल तक पुलिस को चकमा देता रहा सीरियल किलर

एक ऐसा हत्यारा जिसने करीब दो साल तक इलाके में दहशत कायम रखी। न लूट, न दुश्मनी और न ही कोई साफ मकसद—हर वारदात के बाद पुलिस के सामने रहस्य और गहरा होता गया।

फुरसतगंज की रातें कभी इतनी खौफनाक नहीं थीं। गांव में लोग शाम ढलते ही अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे। खेतों से लौटने वाले किसान जल्दी-जल्दी घर पहुंचने लगे थे और घर के बाहर बरामदे में चारपाई डालकर सोने की पुरानी आदत भी धीरे-धीरे खत्म होने लगी थी।

लेकिन डर की असली वजह कोई तूफान, डकैत या जंगली जानवर नहीं था। वजह था एक ऐसा हत्यारा, जिसका चेहरा किसी ने ठीक से नहीं देखा था। वह आता था, गोली चलाता था और गायब हो जाता था।

सबसे बड़ा रहस्य: मृतकों की जेब में रखे पैसे और सामान अक्सर जस के तस मिलते थे। इसका मतलब साफ था कि इन हत्याओं का मकसद लूटपाट नहीं था। हत्यारा महिलाओं और बच्चों को भी निशाना नहीं बनाता था।
45+ उम्र के पुरुष निशाने पर
1 सीने में एक गोली
2 साल जांच और दहशत का दौर

हर बार सीने में सिर्फ एक गोली

पहली नजर में ये हत्याएं किसी सामान्य अपराध जैसी लगती थीं, लेकिन पुलिस के लिए सबसे बड़ा सवाल था—आखिर किसी अजनबी को मारने की वजह क्या हो सकती है?

मरने वालों में ज्यादातर लोग दो तरह के थे। कुछ ऐसे लोग थे जो रात में अपने घर के बाहर बरामदे में सो रहे थे। दूसरे वे थे जो खेतों में काम करके देर रात अकेले घर लौट रहे थे।

हर वारदात का तरीका लगभग बिल्कुल एक जैसा था। सीने में एक गोली। न कोई संघर्ष, न लूटपाट और न ही गोली का दूसरा निशान।

जांच में सामने आया कि गोलियां भरुआ कारतूस यानी देसी तरीके से तैयार किए गए कारतूस से चलाई गई थीं। पुलिस को यह समझ नहीं आ रहा था कि हत्यारा इतनी शांति से वारदात कैसे कर जाता है।

पुलिस चौकी बनने के बाद भी नहीं रुकी हत्याएं

लगातार होती वारदातों को देखते हुए फुरसतगंज में आनन-फानन में पुलिस चौकी बनाई गई। पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ाई गई। रात में गश्त शुरू हुई और संदिग्ध लोगों पर नजर रखी जाने लगी।

लेकिन हत्यारा जैसे पुलिस से एक कदम आगे चल रहा था। इलाके में पुलिस की मौजूदगी बढ़ने के बावजूद हत्याओं का सिलसिला जारी रहा।

अप्रैल 2002

पुलिस के मुताबिक कथित तौर पर पहली हत्या इसी दौर में हुई। इसके बाद एक के बाद एक वारदातों का सिलसिला शुरू हुआ।

लगभग दो साल का खौफ

गांव में हत्याओं के बीच अंतराल रहता था। लोग पिछली वारदात को भूलने लगते, तभी एक नई हत्या सामने आ जाती।

नवंबर 2004

पुलिस के मुताबिक इसी महीने कथित तौर पर आखिरी हत्या हुई।

दिसंबर 2004

जांच के बाद पुलिस ने 57 वर्षीय सदाशिव साहू को गिरफ्तार किया।

शक की सुई पहुंची सदाशिव साहू तक

जांच के दौरान एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति पर पुलिस की नजर बार-बार गई। नाम था—सदाशिव साहू। उम्र करीब 57 साल।

फुरसतगंज में उसकी कपड़े की दुकान थी। वह इलाके का जाना-पहचाना व्यक्ति था। शायद यही वजह थी कि शुरुआती दौर में किसी ने उस पर गंभीर शक नहीं किया।

लेकिन पुलिस की निगाह में कुछ बातें संदिग्ध थीं। पूछताछ बढ़ी तो आखिरकार दिसंबर 2004 में पुलिस ने सदाशिव साहू को गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के अनुसार: सदाशिव साहू ने पूछताछ के दौरान 22 लोगों की हत्या करने की बात कबूल की। पुलिस के मुताबिक पहली हत्या अप्रैल 2002 में और अंतिम वारदात नवंबर 2004 में हुई थी।

आठ पन्नों का कथित कबूलनामा

थाने में साहू ने कथित तौर पर आठ पन्नों का कबूलनामा दिया। उसने पुलिस को बताया कि उसे लगता था जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे इन हत्याओं के लिए उकसा रही थी।

हत्या करने के बाद उसे एक अजीब तरह की शांति महसूस होती थी। उसका कहना था कि वारदात के बाद वह सामान्य तरीके से घर जाकर सो जाता था।

हत्या के बाद मुझे एक अजीब तरह की शांति महसूस होती थी और मैं चैन की नींद सो जाता था।

हत्यारे का तरीका था बेहद खौफनाक

पुलिस के अनुसार साहू अपने शिकार के पास पहुंचता और सामान्य बातचीत करता। वह किसी तरह का संदेह पैदा नहीं होने देता। इसके बाद बेहद करीब जाकर तमंचे से सीने पर गोली चला देता।

करीब से गोली चलने की वजह से आवाज अपेक्षाकृत कम सुनाई देने की बात जांच में सामने आई। पीड़ित की घटनास्थल पर ही मौत हो जाती और हत्यारा वहां से निकल जाता।

सबसे खौफनाक बात यह थी कि आसपास के लोगों को कई बार वारदात का पता तब चलता, जब सुबह शव दिखाई देता।

घर की तलाशी में मिले चौंकाने वाले सामान

सदाशिव साहू के घर की तलाशी के दौरान पुलिस को नकली दाढ़ियां और मूंछें, सफेद कपड़े और रबर के तलवों वाले जूते मिले।

इन सामानों ने जांच को एक नई दिशा दी। पुलिस को आशंका हुई कि वह अपनी पहचान छिपाने और बिना ज्यादा आवाज किए आने-जाने के लिए अलग-अलग भेष और जूतों का इस्तेमाल करता रहा होगा।

⚠️ महत्वपूर्ण नोट

यह लेख उपलब्ध घटनाक्रम और दिए गए विवरण के आधार पर कहानीनुमा प्रस्तुति है। आपराधिक मामलों में पुलिस के आरोप, कथित कबूलनामे और अदालत में सिद्ध तथ्य अलग-अलग हो सकते हैं।

फुरसतगंज की उन रातों का खौफ

दो साल तक फुरसतगंज के लोगों के बीच रहकर, सामान्य जीवन जीते हुए और अपनी दुकान चलाते हुए एक व्यक्ति पर इतनी गंभीर वारदातों का आरोप लगना पूरे इलाके के लिए किसी सदमे से कम नहीं था।

फुरसतगंज की वे रातें लोगों के जेहन में लंबे समय तक बनी रहीं। बरामदे में सोने से डरने वाले लोग, खेतों से जल्दी लौटते किसान और हर अनजान कदम की आवाज पर चौकन्ना हो जाने वाले ग्रामीण—सभी के मन में एक ही सवाल था।

इतने लंबे समय तक उनके बीच रहने वाला वह खामोश कातिल आखिर कौन था?

जब सदाशिव साहू का नाम सामने आया, तो लोगों को एहसास हुआ कि कभी-कभी सबसे बड़ा खतरा दूर से आता हुआ दिखाई नहीं देता। वह हमारे बीच सामान्य चेहरा बनकर भी मौजूद हो सकता है।

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