फुरसतगंज का खामोश कातिल
फुरसतगंज का खामोश कातिल: दो साल तक पुलिस को चकमा देता रहा सीरियल किलर
एक ऐसा हत्यारा जिसने करीब दो साल तक इलाके में दहशत कायम रखी। न लूट, न दुश्मनी और न ही कोई साफ मकसद—हर वारदात के बाद पुलिस के सामने रहस्य और गहरा होता गया।
फुरसतगंज की रातें कभी इतनी खौफनाक नहीं थीं। गांव में लोग शाम ढलते ही अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे। खेतों से लौटने वाले किसान जल्दी-जल्दी घर पहुंचने लगे थे और घर के बाहर बरामदे में चारपाई डालकर सोने की पुरानी आदत भी धीरे-धीरे खत्म होने लगी थी।
लेकिन डर की असली वजह कोई तूफान, डकैत या जंगली जानवर नहीं था। वजह था एक ऐसा हत्यारा, जिसका चेहरा किसी ने ठीक से नहीं देखा था। वह आता था, गोली चलाता था और गायब हो जाता था।
हर बार सीने में सिर्फ एक गोली
पहली नजर में ये हत्याएं किसी सामान्य अपराध जैसी लगती थीं, लेकिन पुलिस के लिए सबसे बड़ा सवाल था—आखिर किसी अजनबी को मारने की वजह क्या हो सकती है?
मरने वालों में ज्यादातर लोग दो तरह के थे। कुछ ऐसे लोग थे जो रात में अपने घर के बाहर बरामदे में सो रहे थे। दूसरे वे थे जो खेतों में काम करके देर रात अकेले घर लौट रहे थे।
हर वारदात का तरीका लगभग बिल्कुल एक जैसा था। सीने में एक गोली। न कोई संघर्ष, न लूटपाट और न ही गोली का दूसरा निशान।
जांच में सामने आया कि गोलियां भरुआ कारतूस यानी देसी तरीके से तैयार किए गए कारतूस से चलाई गई थीं। पुलिस को यह समझ नहीं आ रहा था कि हत्यारा इतनी शांति से वारदात कैसे कर जाता है।
पुलिस चौकी बनने के बाद भी नहीं रुकी हत्याएं
लगातार होती वारदातों को देखते हुए फुरसतगंज में आनन-फानन में पुलिस चौकी बनाई गई। पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ाई गई। रात में गश्त शुरू हुई और संदिग्ध लोगों पर नजर रखी जाने लगी।
लेकिन हत्यारा जैसे पुलिस से एक कदम आगे चल रहा था। इलाके में पुलिस की मौजूदगी बढ़ने के बावजूद हत्याओं का सिलसिला जारी रहा।
अप्रैल 2002
पुलिस के मुताबिक कथित तौर पर पहली हत्या इसी दौर में हुई। इसके बाद एक के बाद एक वारदातों का सिलसिला शुरू हुआ।
लगभग दो साल का खौफ
गांव में हत्याओं के बीच अंतराल रहता था। लोग पिछली वारदात को भूलने लगते, तभी एक नई हत्या सामने आ जाती।
नवंबर 2004
पुलिस के मुताबिक इसी महीने कथित तौर पर आखिरी हत्या हुई।
दिसंबर 2004
जांच के बाद पुलिस ने 57 वर्षीय सदाशिव साहू को गिरफ्तार किया।
शक की सुई पहुंची सदाशिव साहू तक
जांच के दौरान एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति पर पुलिस की नजर बार-बार गई। नाम था—सदाशिव साहू। उम्र करीब 57 साल।
फुरसतगंज में उसकी कपड़े की दुकान थी। वह इलाके का जाना-पहचाना व्यक्ति था। शायद यही वजह थी कि शुरुआती दौर में किसी ने उस पर गंभीर शक नहीं किया।
लेकिन पुलिस की निगाह में कुछ बातें संदिग्ध थीं। पूछताछ बढ़ी तो आखिरकार दिसंबर 2004 में पुलिस ने सदाशिव साहू को गिरफ्तार कर लिया।
आठ पन्नों का कथित कबूलनामा
थाने में साहू ने कथित तौर पर आठ पन्नों का कबूलनामा दिया। उसने पुलिस को बताया कि उसे लगता था जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे इन हत्याओं के लिए उकसा रही थी।
हत्या करने के बाद उसे एक अजीब तरह की शांति महसूस होती थी। उसका कहना था कि वारदात के बाद वह सामान्य तरीके से घर जाकर सो जाता था।
हत्या के बाद मुझे एक अजीब तरह की शांति महसूस होती थी और मैं चैन की नींद सो जाता था।
हत्यारे का तरीका था बेहद खौफनाक
पुलिस के अनुसार साहू अपने शिकार के पास पहुंचता और सामान्य बातचीत करता। वह किसी तरह का संदेह पैदा नहीं होने देता। इसके बाद बेहद करीब जाकर तमंचे से सीने पर गोली चला देता।
करीब से गोली चलने की वजह से आवाज अपेक्षाकृत कम सुनाई देने की बात जांच में सामने आई। पीड़ित की घटनास्थल पर ही मौत हो जाती और हत्यारा वहां से निकल जाता।
सबसे खौफनाक बात यह थी कि आसपास के लोगों को कई बार वारदात का पता तब चलता, जब सुबह शव दिखाई देता।
घर की तलाशी में मिले चौंकाने वाले सामान
सदाशिव साहू के घर की तलाशी के दौरान पुलिस को नकली दाढ़ियां और मूंछें, सफेद कपड़े और रबर के तलवों वाले जूते मिले।
इन सामानों ने जांच को एक नई दिशा दी। पुलिस को आशंका हुई कि वह अपनी पहचान छिपाने और बिना ज्यादा आवाज किए आने-जाने के लिए अलग-अलग भेष और जूतों का इस्तेमाल करता रहा होगा।
⚠️ महत्वपूर्ण नोट
यह लेख उपलब्ध घटनाक्रम और दिए गए विवरण के आधार पर कहानीनुमा प्रस्तुति है। आपराधिक मामलों में पुलिस के आरोप, कथित कबूलनामे और अदालत में सिद्ध तथ्य अलग-अलग हो सकते हैं।
फुरसतगंज की उन रातों का खौफ
दो साल तक फुरसतगंज के लोगों के बीच रहकर, सामान्य जीवन जीते हुए और अपनी दुकान चलाते हुए एक व्यक्ति पर इतनी गंभीर वारदातों का आरोप लगना पूरे इलाके के लिए किसी सदमे से कम नहीं था।
फुरसतगंज की वे रातें लोगों के जेहन में लंबे समय तक बनी रहीं। बरामदे में सोने से डरने वाले लोग, खेतों से जल्दी लौटते किसान और हर अनजान कदम की आवाज पर चौकन्ना हो जाने वाले ग्रामीण—सभी के मन में एक ही सवाल था।
जब सदाशिव साहू का नाम सामने आया, तो लोगों को एहसास हुआ कि कभी-कभी सबसे बड़ा खतरा दूर से आता हुआ दिखाई नहीं देता। वह हमारे बीच सामान्य चेहरा बनकर भी मौजूद हो सकता है।
