एथेनॉल की बढ़ती मांग का असर अब अंडे पर

एथेनॉल की बढ़ती मांग का असर अब अंडे पर

एथेनॉल की बढ़ती मांग का असर अब अंडे पर! महंगा हुआ मक्का, पोल्ट्री फीड की बढ़ी लागत
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एथेनॉल की बढ़ती मांग का असर अब अंडे पर! महंगा हुआ मक्का, पोल्ट्री फीड की बढ़ी लागत

मक्के की बढ़ती मांग और कीमतों ने पोल्ट्री उद्योग की चिंता बढ़ा दी है। इसका असर अंडे की कीमतों पर दिखाई देने लगा है और आने वाले समय में चिकन की कीमतों पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है।

नई दिल्ली। पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को लेकर देश में लंबे समय से बहस चल रही है। सरकार जहां पेट्रोल की कीमतों और महंगाई के लिए एथेनॉल को सीधे तौर पर जिम्मेदार मानने से इनकार करती रही है, वहीं बाजार में इसका एक अलग असर दिखाई देने लगा है। अब एथेनॉल की बढ़ती मांग का असर पेट्रोल से आगे बढ़कर आम आदमी की रसोई तक पहुंचता नजर आ रहा है। इस बार इसकी मार अंडे और आने वाले दिनों में चिकन की कीमतों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

दरअसल, एथेनॉल उत्पादन में मक्का के बढ़ते इस्तेमाल ने पोल्ट्री उद्योग की चिंता बढ़ा दी है। मक्का मुर्गियों के दाने यानी पोल्ट्री फीड का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में जब मक्के का बड़ा हिस्सा एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होने लगा, तो पोल्ट्री उद्योग के लिए इसकी उपलब्धता कम हुई और कीमत तेजी से बढ़ने लगी। इसका सीधा असर मुर्गियों के पालन की लागत और अंततः अंडे की कीमत पर पड़ रहा है।

35–40% पिछले एक साल में अंडों की कीमतों में बढ़ोतरी
₹26,500 लगभग प्रति टन तक पहुंचा मक्के का दाम
17 MT एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने वाला मक्का

एक साल में 40 फीसदी तक महंगे हुए अंडे

नेशनल एग को-ऑर्डिनेशन कमिटी यानी NECC के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले एक साल में अंडों की कीमतों में करीब 35 से 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। पोल्ट्री फार्म स्तर पर एक अंडे की कीमत करीब 7 रुपये तक पहुंच गई है, जबकि खुदरा बाजार में उपभोक्ताओं को यही अंडा लगभग 8.50 से 9 रुपये में मिल रहा है।

पोल्ट्री उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि कीमतों में बढ़ोतरी का सिलसिला अभी थमने वाला नहीं है। खासकर सर्दियों में अंडों की मांग बढ़ जाती है। देश के कई हिस्सों में ठंड के मौसम में अंडे की खपत तेजी से बढ़ती है। ऐसे में यदि उत्पादन लागत इसी तरह बढ़ती रही तो आने वाले महीनों में उपभोक्ताओं को अंडे के लिए और अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

महत्वपूर्ण: सर्दियों में अंडों की मांग बढ़ने के कारण यदि पोल्ट्री फीड की लागत ऊंची बनी रहती है, तो बाजार में अंडे की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

मक्का बना सबसे बड़ी चिंता

पोल्ट्री उद्योग के लिए सबसे बड़ी समस्या मक्के की बढ़ती कीमत है। बताया जा रहा है कि करीब तीन साल पहले मक्का लगभग 14,000 रुपये प्रति टन के आसपास उपलब्ध था। अब इसकी कीमत बढ़कर लगभग 26,500 रुपये प्रति टन तक पहुंच गई है। पिछले कुछ महीनों में भी मक्के की कीमत में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

पोल्ट्री किसानों के लिए यह चिंता इसलिए गंभीर है क्योंकि मक्का उनके कुल उत्पादन खर्च का लगभग 65 से 70 फीसदी हिस्सा तक प्रभावित कर सकता है। मक्के की कीमत बढ़ने का मतलब सीधे तौर पर पोल्ट्री फीड महंगा होना है। इसके बाद बढ़ी हुई लागत अंडे और चिकन की बिक्री कीमत में दिखाई देती है।

एथेनॉल उद्योग और पोल्ट्री सेक्टर आमने-सामने

भारत में एथेनॉल मिश्रण नीति के तहत पेट्रोल में जैव ईंधन का इस्तेमाल लगातार बढ़ाया जा रहा है। एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के साथ-साथ मक्के का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा है। इससे एक तरफ देश को वैकल्पिक ईंधन के क्षेत्र में आगे बढ़ने में मदद मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ मक्का आधारित उद्योगों के सामने कच्चे माल की उपलब्धता की चुनौती खड़ी हो रही है।

पोल्ट्री उद्योग देश में उत्पादित मक्के का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल करता है। इसलिए जब एथेनॉल उद्योग भी उसी मक्के की मांग बढ़ाता है तो दोनों क्षेत्रों के बीच प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। यही स्थिति अब पोल्ट्री फीड की लागत को प्रभावित कर रही है।

मांग बढ़ने का सीधा असर

एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की मांग बढ़ने से पोल्ट्री उद्योग को उसी कच्चे माल के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। इससे फीड लागत बढ़ती है और इसका प्रभाव उत्पादन कीमतों पर दिखाई दे सकता है।

43.4 मिलियन टन उत्पादन, फिर भी बढ़ी कमी

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में मक्के का कुल उत्पादन लगभग 43.4 मिलियन टन के आसपास है। इसमें से करीब 17 मिलियन टन मक्का अब एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने की बात कही जा रही है। इसका अर्थ है कि मक्के की उपलब्धता का एक बड़ा हिस्सा ईंधन उद्योग की ओर जा रहा है।

मक्का से एथेनॉल उत्पादन में पिछले कुछ वर्षों में तेजी देखी गई है। 2022 में जहां इसका स्तर लगभग 1 मिलियन टन बताया जाता था, वहीं 2024 में यह बढ़कर करीब 6 मिलियन टन हो गया और अब लगभग 17 मिलियन टन तक पहुंचने की बात सामने आ रही है। यदि यह रफ्तार जारी रही तो आने वाले वर्षों में एथेनॉल के लिए मक्के की मांग और बढ़ सकती है।

क्या सिर्फ एथेनॉल जिम्मेदार है?

हालांकि, अंडे की कीमतों में बढ़ोतरी को केवल एथेनॉल से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं होगी। पोल्ट्री उद्योग के विशेषज्ञों के मुताबिक गर्मी का तनाव, मुर्गियों की मृत्यु दर, मौसम में बदलाव, सोयाबीन और दूसरे चारे की कीमत, आयातित फीड की उपलब्धता और बाजार में मांग जैसे कई कारक अंडे की कीमत को प्रभावित करते हैं।

यानी एथेनॉल मक्के की मांग बढ़ाने वाला एक महत्वपूर्ण कारक हो सकता है, लेकिन अंडे की कीमत तय करने में कई अन्य परिस्थितियां भी भूमिका निभाती हैं।

अंडे की कीमतों में बदलाव को समझने के लिए केवल एथेनॉल नहीं, बल्कि मक्का, सोयाबीन, मौसम, पोल्ट्री उत्पादन और बाजार की मांग जैसे सभी कारकों को एक साथ देखना जरूरी है।

भारत अब मक्का आयात कर रहा है

मक्के की बढ़ती घरेलू मांग का असर भारत के व्यापार पर भी दिखाई देने लगा है। कभी भारत बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों को मक्का निर्यात करता था, लेकिन घरेलू खपत बढ़ने के कारण निर्यात योग्य मक्का कम हो गया है। परिणामस्वरूप भारत को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए मक्का आयात करना पड़ रहा है।

वित्त वर्ष 2025 में भारत का मक्का आयात करीब 1 मिलियन टन के ऐतिहासिक स्तर तक पहुंचने की बात कही गई है। इसके बाद भी आयात जारी रहने से संकेत मिलता है कि घरेलू उत्पादन और मांग के बीच अंतर बढ़ रहा है।

आगे क्या होगा?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि एथेनॉल के लिए मक्के की मांग लगातार बढ़ती रही तो पोल्ट्री उद्योग अपनी जरूरत कैसे पूरी करेगा। यदि देश में मक्के का उत्पादन उसी गति से नहीं बढ़ा, तो आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है। इसका असर फीड की लागत पर पड़ सकता है और अंततः अंडे तथा चिकन दोनों की कीमतें प्रभावित हो सकती हैं।

एथेनॉल भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन इसके साथ खाद्य और पशु आहार की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना भी उतना ही जरूरी है। आने वाले समय में सरकार के सामने चुनौती यही होगी कि एथेनॉल नीति आगे बढ़े, किसानों को मक्के का बेहतर बाजार मिले और साथ ही पोल्ट्री उद्योग के लिए पर्याप्त मात्रा में किफायती मक्का भी उपलब्ध रहे।

फिलहाल इतना तय है कि एथेनॉल की कहानी केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रह गई है। मक्के की कीमतों के रास्ते इसका असर पोल्ट्री फीड तक पहुंच चुका है और यदि हालात नहीं बदले तो आने वाले समय में इसकी कीमत आम उपभोक्ता की थाली में अंडे और चिकन के रूप में भी महसूस हो सकती है।

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