मैहर में बंदरों का आतंक: ग्रामीणों ने मांगी ‘इच्छा मृत्यु’
मैहर में बंदरों का आतंक: ग्रामीणों ने मांगी ‘इच्छा मृत्यु’, राष्ट्रपति को ज्ञापन देकर कहा- या तो बंदरों को पकड़ो या हमें मार डालो
ग्रामीणों ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपकर कहा है कि यदि बंदरों की समस्या का जल्द स्थायी समाधान नहीं किया गया तो उन्हें ‘इच्छा मृत्यु’ की अनुमति दी जाए। ग्रामीणों का कहना है कि वे लंबे समय से बंदरों के आतंक का सामना कर रहे हैं, लेकिन शिकायतों के बावजूद समस्या का प्रभावी समाधान नहीं हो सका।
बंदरों के झुंड न केवल घरों और दुकानों में घुसकर सामान को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि खेतों में खड़ी फसलों को भी बर्बाद कर रहे हैं। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को विशेष रूप से खतरा महसूस हो रहा है।
🔴 मामले की बड़ी बातें
- मैहर के ग्रामीण बंदरों के लगातार बढ़ते आतंक से परेशान हैं।
- बंदर घरों, दुकानों, स्कूलों और खेतों में पहुंचकर नुकसान पहुंचा रहे हैं।
- फसलों और घरेलू सामान को नुकसान पहुंचने की शिकायतें सामने आई हैं।
- ग्रामीणों ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा।
- बंदर पकड़ने के लिए पर्याप्त फंड और स्पष्ट व्यवस्था की कमी को बड़ी समस्या बताया गया है।
- ग्रामीणों ने समस्या का तत्काल और स्थायी समाधान करने की मांग की है।
घर से स्कूल और खेत तक बंदरों का आतंक
ग्रामीणों के मुताबिक बंदरों के झुंड दिनभर गांव में घूमते रहते हैं। मौका मिलते ही वे घरों की छतों और आंगनों में पहुंच जाते हैं। कई जगहों पर दुकानों और घरों से सामान उठा ले जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
खेतों में पहुंचने के बाद बंदर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि फसल तैयार होने के समय बंदरों के झुंड खेतों में पहुंचकर काफी नुकसान कर देते हैं।
सबसे अधिक चिंता बच्चों और बुजुर्गों को लेकर जताई जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार बंदरों के डर के कारण कई लोग जरूरी काम के लिए भी अकेले घर से बाहर निकलने से बच रहे हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी अभिभावक चिंतित हैं।
“ग्रामीणों की मांग अब केवल बंदरों को पकड़ने तक सीमित नहीं है। वे अपनी सुरक्षा और रोजमर्रा के जीवन में सामान्य स्थिति बहाल करने की मांग कर रहे हैं।”
राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन
बताया गया कि शुक्रवार को बड़ी संख्या में ग्रामीण मैहर कलेक्टर कार्यालय पहुंचे। ग्रामीणों ने कलेक्टर के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपकर बंदरों की समस्या के तत्काल समाधान की मांग की।
ज्ञापन में ग्रामीणों ने कहा कि यदि प्रशासन बंदरों को पकड़ने और उन्हें गांवों से दूर करने की व्यवस्था नहीं कर सकता तो उन्हें इच्छा मृत्यु की अनुमति दी जाए। ग्रामीणों की यह मांग उनके गुस्से और लंबे समय से चली आ रही परेशानी को दर्शाती है।
‘इच्छा मृत्यु’ जैसी मांग बेहद गंभीर और संवेदनशील है। ऐसी भाषा इस बात का संकेत है कि ग्रामीण खुद को लंबे समय से उपेक्षित और असहाय महसूस कर रहे हैं। प्रशासन के लिए चुनौती केवल बंदरों को पकड़ना नहीं, बल्कि ग्रामीणों में सुरक्षा और विश्वास की भावना बहाल करना भी है।
फंड की कमी बनी बड़ी बाधा
ग्रामीणों के अनुसार समस्या का एक बड़ा कारण बंदरों को पकड़ने के लिए पर्याप्त बजट और स्पष्ट व्यवस्था का अभाव है। बड़ी इत्मा गांव के सरपंच प्रतिनिधि सुभाष पांडे के मुताबिक पंचायतों के पास विकास कार्यों के लिए अलग-अलग मदों में धन उपलब्ध होता है, लेकिन बंदरों को पकड़ने के लिए खर्च करने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
ऐसे में पंचायतें चाहकर भी व्यापक स्तर पर बंदर पकड़ने का अभियान शुरू नहीं कर पा रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब समस्या लगातार बढ़ रही है तो सरकार और प्रशासन को इसके लिए अलग से बजट और जिम्मेदारी तय करनी चाहिए।
2022 के बाद बदली व्यवस्था का असर
ग्रामीणों द्वारा उठाए गए मुद्दे में वन्यजीव संबंधी नियमों का भी उल्लेख किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्ष 2022 में लाल मुंह वाले बंदरों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की संबंधित अनुसूचियों से हटाए जाने के बाद उन्हें पकड़ने के खर्च को लेकर विभागीय जिम्मेदारी का सवाल खड़ा हुआ।
बताया जा रहा है कि वन विभाग ने बंदरों को पकड़ने के खर्च की जिम्मेदारी लेने से इनकार किया, जिसके बाद स्थानीय निकायों के सामने समस्या पैदा हो गई।
ग्रामीणों का दावा है कि कुछ अन्य राज्यों में बंदरों को पकड़ने के लिए जिला स्तर पर निर्धारित प्रक्रिया और दरें मौजूद हैं, जबकि मध्य प्रदेश में ऐसी स्पष्ट व्यवस्था का अभाव समस्या को और बढ़ा रहा है।
स्थायी समाधान की जरूरत
बंदरों की समस्या केवल मैहर तक सीमित नहीं है। देश के कई ग्रामीण और शहरी इलाकों में मानव-बंदर संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। जंगलों और प्राकृतिक आवासों में बदलाव, भोजन की उपलब्धता और आबादी वाले क्षेत्रों का विस्तार इसके पीछे कई कारणों में शामिल हो सकते हैं।
ऐसे में केवल कुछ बंदरों को पकड़कर दूसरे स्थान पर छोड़ देना स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। प्रशासन को विशेषज्ञों की मदद से ऐसी नीति तैयार करनी होगी, जिसमें बंदरों को सुरक्षित तरीके से पकड़ना, उनकी आबादी का वैज्ञानिक प्रबंधन और उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा शामिल हो।
सुरक्षित पकड़ अभियान
प्रशिक्षित टीमों की मदद से आबादी वाले क्षेत्रों में बंदरों को सुरक्षित तरीके से पकड़ने की व्यवस्था हो।
स्पष्ट बजट व्यवस्था
बंदर पकड़ने और मानव-बंदर संघर्ष से निपटने के लिए अलग बजट और जिम्मेदार विभाग तय किया जाए।
ग्रामीणों की सुरक्षा
स्कूलों, बाजारों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में विशेष सुरक्षा उपाय किए जाएं।
फसल नुकसान का समाधान
बंदरों से फसल और संपत्ति को होने वाले नुकसान के लिए प्रभावी राहत एवं मुआवजा व्यवस्था पर विचार किया जाए।
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
मैहर के ग्रामीणों द्वारा राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपना इस समस्या की गंभीरता को सामने लाता है। ‘इच्छा मृत्यु’ की मांग को किसी भी स्थिति में सामान्य शिकायत नहीं माना जा सकता। यह प्रशासन के लिए एक चेतावनी है कि समस्या का समाधान जल्द और संवेदनशील तरीके से किया जाना चाहिए।
ग्रामीणों की मांग स्पष्ट है—बंदरों के आतंक से उन्हें राहत मिले और इसके लिए जिम्मेदार विभाग तथा प्रशासन मिलकर ठोस कार्रवाई करें। अब देखना होगा कि मैहर प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है और बंदरों को पकड़ने के लिए फंड तथा स्पष्ट नीति की समस्या का समाधान किस तरह किया जाता है।
फिलहाल मैहर के ग्रामीणों की परेशानी ने मानव और वन्यजीव संघर्ष से जुड़ी उस बड़ी चुनौती को फिर सामने ला दिया है, जिसका समाधान केवल तत्काल कार्रवाई से नहीं बल्कि स्पष्ट नीति, पर्याप्त बजट और दीर्घकालिक योजना से ही संभव है।
समस्या का समाधान जरूरी
ग्रामीणों की सुरक्षा, फसलों की रक्षा और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए प्रशासन को तत्काल प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। स्थायी समाधान के लिए स्पष्ट नीति, पर्याप्त बजट और जिम्मेदार विभागों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होगा।
