प्रयागराज की व्यवस्था में इच्छाशक्ति बनाम जड़ हो चुकी कार्यसंस्कृति
प्रयागराज की व्यवस्था में इच्छाशक्ति बनाम जड़ हो चुकी कार्यसंस्कृति
यही वह बिंदु है जहां प्रयागराज की प्रशासनिक व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती के सामने खड़ी दिखाई देती है। एक अधिकारी की सक्रियता और पूरी व्यवस्था की कार्यक्षमता में अंतर हो तो किसी भी सुधार की गति सीमित हो जाती है।
आदेश के बाद भी क्यों धीमी रहती है कार्रवाई?
जिलाधिकारी कार्यालय से लेकर तहसीलों और विभिन्न विभागों तक आम नागरिकों की सबसे बड़ी शिकायत कार्य की धीमी गति और अनावश्यक प्रक्रिया को लेकर रहती है।
किसी प्रार्थनापत्र पर आदेश हो जाने के बाद उसी मामले में बार-बार फॉलोअप मंगाना, फिर अधीनस्थ अधिकारियों से फोन पर जानकारी लेना और उसके बाद भी समस्या का समाधान न होना आखिर किस प्रशासनिक व्यवस्था का संकेत है?
यदि एक अधिकारी आदेश कर चुका है तो उसके आदेश का अनुपालन कराना भी उसी व्यवस्था की जिम्मेदारी होनी चाहिए। नागरिक को बार-बार कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ें तो फिर आदेश और कार्रवाई के बीच का अंतर सवाल खड़ा करता है।
आदेश तभी प्रभावी माना जाएगा, जब उसका असर फाइल से निकलकर जमीन पर दिखाई दे।
समस्या केवल व्यक्ति की नहीं, कार्यसंस्कृति की है
यह समस्या केवल किसी एक व्यक्ति या एक कार्यालय की नहीं है। असली समस्या उस कार्यसंस्कृति की है जिसमें काम की गति धीमी हो जाती है और नागरिक को अपने ही काम के लिए लगातार प्रयास करना पड़ता है।
यही स्थिति धीरे-धीरे लोगों में यह धारणा पैदा करती है कि सरकारी कार्यालय में बिना किसी अतिरिक्त प्रभाव, सिफारिश या आर्थिक लेन-देन के काम कराना कठिन है।
क्या आम नागरिक को अपने वैध सरकारी काम के लिए बार-बार कार्यालय जाना चाहिए, या प्रशासनिक व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि आवेदन से लेकर अंतिम कार्रवाई तक हर चरण की स्पष्ट निगरानी हो?
विभागों में पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत
प्रयागराज में लंबे समय से विभिन्न सरकारी विभागों को लेकर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती रही हैं। असलहा विभाग हो, आपूर्ति से जुड़े कार्यालय हों, विकास विभाग हो या रिकॉर्ड रूम—आम आदमी की शिकायत यही रहती है कि सामान्य काम भी अपेक्षित समय में नहीं होता।
नकल जैसे साधारण दस्तावेज को प्राप्त करने में भी यदि महीनों लग जाएं तो सवाल केवल कर्मचारी की कार्यक्षमता पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर उठता है।
तहसीलों की कार्यप्रणाली सबसे बड़ी चुनौती
सबसे गंभीर स्थिति तहसीलों की है। भूमि, राजस्व और प्रमाणपत्र से जुड़े मामलों में आम नागरिक सीधे प्रशासनिक तंत्र पर निर्भर होता है।
लेखपाल से लेकर कानूनगो, तहसीलदार और उपजिलाधिकारी तक की पूरी श्रृंखला नागरिक के अधिकारों और संपत्ति से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करती है।
ऐसे में यदि कहीं भ्रष्टाचार, पक्षपात या प्रभावशाली लोगों के दबाव की शिकायत सामने आती है तो उसका असर केवल एक व्यक्ति पर नहीं पड़ता, बल्कि शासन के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर करता है।
हालांकि किसी भी व्यवस्था में भ्रष्टाचार के आरोपों को बिना प्रमाण सभी कर्मचारियों या अधिकारियों पर लागू करना उचित नहीं होगा। ईमानदार अधिकारी और कर्मचारी हर सरकारी तंत्र में होते हैं। लेकिन शिकायतों की निरंतरता स्वयं इस बात का संकेत है कि व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
क्या जिलाधिकारी अकेले व्यवस्था बदल सकते हैं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एक जिलाधिकारी अकेले इस पूरी व्यवस्था को बदल सकता है? निश्चित रूप से जिलाधिकारी के पास प्रशासनिक अधिकार होते हैं, लेकिन किसी व्यवस्था को बदलने के लिए केवल आदेश पर्याप्त नहीं होते।
आदेश के साथ उसकी निगरानी, समयबद्ध अनुपालन और दोषी पाए जाने पर वास्तविक कार्रवाई भी जरूरी है।
प्रशासन की असली सफलता जिलाधिकारी के आदेशों की संख्या में नहीं, बल्कि उन आदेशों के जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों में होती है।
कर्मचारी तंत्र में जवाबदेही कैसे आए?
कर्मचारी संगठनों की एकजुटता भी प्रशासन के सामने एक चुनौती हो सकती है। किसी भी विभाग में यदि कर्मचारी यह मान लें कि कार्रवाई की संभावना कम है, तो व्यवस्था में सुधार की गति स्वाभाविक रूप से धीमी पड़ जाती है।
इसलिए प्रशासन को व्यक्ति आधारित कार्रवाई के बजाय सिस्टम आधारित जवाबदेही विकसित करनी होगी।
समाधान केवल कार्रवाई नहीं, सिस्टम में बदलाव है
जरूरत इस बात की है कि हर प्रार्थनापत्र के लिए स्पष्ट समयसीमा तय हो। किस अधिकारी के पास आवेदन गया, किस दिन आदेश हुआ और कब तक उसका अनुपालन होना है—यह सब डिजिटल रूप से दर्ज हो।
- प्रत्येक आवेदन के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की जाए।
- आवेदन की स्थिति ऑनलाइन ट्रैक करने की व्यवस्था मजबूत की जाए।
- आदेश होने के बाद अनुपालन की अलग से निगरानी हो।
- निर्धारित समय में काम न होने पर जिम्मेदारी तय की जाए।
- शिकायतों की स्वतंत्र और निष्पक्ष समीक्षा की जाए।
- नागरिक को बार-बार कार्यालय आने की आवश्यकता कम की जाए।
इससे भ्रष्टाचार की संभावनाएं भी कम होंगी और काम की गति भी बढ़ेगी। डिजिटल व्यवस्था का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा जब वह केवल रिकॉर्ड रखने तक सीमित न रहे, बल्कि अधिकारी और कर्मचारी की जवाबदेही भी तय करे।
जनता के विश्वास की असली परीक्षा
प्रयागराज जैसे महत्वपूर्ण जिले में प्रशासन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि जिलाधिकारी कितने सक्रिय हैं। असली कसौटी यह है कि आम आदमी का काम कितनी आसानी से और कितने समय में होता है।
जिलाधिकारी की मेहनत तभी दिखाई देगी जब उसका प्रभाव तहसील के अंतिम काउंटर और गांव के अंतिम नागरिक तक पहुंचे।
आज आवश्यकता किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को बदलने की है जिसमें नागरिक को अपने अधिकार के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।
व्यवस्था तभी बदलती है जब आदेश कागज से निकलकर जमीन पर दिखाई दे। प्रयागराज को आज इसी बदलाव की सबसे अधिक जरूरत है।
