नेपाल जैसी तबाही के बाद जम्मू-कश्मीर पर बढ़ी चिंता

नेपाल जैसी तबाही के बाद जम्मू-कश्मीर पर बढ़ी चिंता

नेपाल जैसी तबाही के बाद जम्मू-कश्मीर पर बढ़ी चिंता, GLOF और बड़े भूकंप का खतरा ``` ```
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नेपाल जैसी तबाही के बाद जम्मू-कश्मीर पर बढ़ी चिंता, GLOF और बड़े भूकंप का खतरा बना गंभीर चुनौती

तेजी से पिघलते ग्लेशियर, संवेदनशील ग्लेशियर झीलें, भूस्खलन और भूकंपीय खतरे ने जम्मू-कश्मीर को लेकर वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।

नेपाल में हुई प्राकृतिक तबाही के बाद पूरे हिमालयी क्षेत्र के सामने एक नई चेतावनी खड़ी हो गई है। जम्मू-कश्मीर में मौजूद ग्लेशियर झीलें, तेजी से पिघलते हिमनद, संवेदनशील पहाड़ी ढलान और भूकंप का खतरा भविष्य में किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा की आशंका को बढ़ा रहे हैं।

नेपाल में हाल में हुई भारी प्राकृतिक तबाही ने पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए गंभीर चिंता पैदा कर दी है। इस घटना के बाद जम्मू-कश्मीर को लेकर वैज्ञानिकों, रिसर्चर्स और पर्यावरणविदों की चिंता और बढ़ गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते वैज्ञानिक निगरानी, रणनीतिक योजना और मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था विकसित नहीं की गई, तो ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़ यानी GLOF (Glacial Lake Outburst Flood), भूस्खलन और शक्तिशाली भूकंप जैसी घटनाएं व्यापक तबाही का कारण बन सकती हैं।

155

ग्लेशियर झीलों का खतरे के लिहाज से आकलन

5

झीलें अत्यधिक जोखिम वाली श्रेणी में

18,000

तेजी से पिघलते ग्लेशियरों को लेकर चिंता

अचानक ग्लेशियर झील फटने से आ सकती है विनाशकारी बाढ़

विभिन्न रिसर्च और सर्वेक्षणों में जम्मू-कश्मीर के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर झीलों और अस्थिर भू-भाग को लेकर चिंता जताई गई है।

वैज्ञानिकों के अनुसार किसी ग्लेशियर झील में अचानक बर्फ या चट्टान का बड़ा हिस्सा गिरने, भूस्खलन होने, जलस्तर तेजी से बढ़ने या प्राकृतिक बांध टूटने की स्थिति में भारी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है।

इस तरह की घटना को GLOF कहा जाता है। इसमें कुछ ही समय में भारी मात्रा में पानी, बर्फ, पत्थर और मलबा तेज गति से निचले इलाकों की ओर बढ़ सकता है।

⚠️ विशेषज्ञों की चेतावनी

एक बड़े GLOF की स्थिति में हजारों इमारतें, सड़कें, पुल, नदी किनारे बसे गांव और महत्वपूर्ण पनबिजली परियोजनाएं गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं।

पांच ग्लेशियर झीलों को माना गया अत्यधिक जोखिम वाला

हाल के सर्वे आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में लगभग 155 ग्लेशियर झीलों का GLOF से जुड़े खतरों के लिहाज से आकलन किया गया है।

इनमें से पांच झीलों को अत्यधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। इनमें ब्रमसार, चिरसार, नंडकोल, गंगाबल और भागसार झीलें शामिल हैं।

नेपाल जैसी तबाही की संभावना से इनकार नहीं

नेपाल में हुई तबाही ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और ग्लेशियर झीलों से जुड़े जोखिम को फिर से दुनिया के सामने ला दिया है।

“हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ऊंचाई वाली झीलों और तेजी से बदलते ग्लेशियर सिस्टम को देखते हुए ऐसी घटनाओं की संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। इसलिए प्रशासन और वैज्ञानिक संस्थानों को पहले से तैयारी करनी होगी।” — पर्यावरण और आपदा जोखिम से जुड़े विशेषज्ञों की चिंता

तेजी से पिघल रहे हैं हजारों ग्लेशियर

रिसर्चर्स ने जम्मू-कश्मीर में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की स्थिति पर भी गंभीर चिंता जताई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार क्षेत्र में लगभग 18 हजार ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की स्थिति पर लगातार नजर रखे जाने की आवश्यकता है।

जोखिम वाले प्रमुख क्षेत्र

  • दक्षिण और मध्य कश्मीर के ऊंचाई वाले इलाके
  • लद्दाख के ग्लेशियर क्षेत्र
  • किश्तवाड़ के पहाड़ी इलाके
  • डोडा और आसपास के संवेदनशील क्षेत्र
  • नदी घाटियों और ढलानों के पास बसे गांव
  • पनबिजली और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा क्षेत्र

बड़े भूकंप की आशंका ने बढ़ाई चिंता

जम्मू-कश्मीर की भूकंपीय संवेदनशीलता भी वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है। शक्तिशाली भूकंप की स्थिति में केवल इमारतों को नुकसान नहीं होगा, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भूस्खलन की घटनाएं भी हो सकती हैं।

यदि किसी बड़े भूकंप के कारण पहाड़ों की ढलानें खिसकती हैं या ग्लेशियर झीलों के आसपास मौजूद प्राकृतिक बांध प्रभावित होते हैं, तो इसके परिणाम और भी खतरनाक हो सकते हैं।

43 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में भूस्खलन का खतरा

हाल के एक आकलन में जम्मू-कश्मीर के लगभग 43 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को भूस्खलन के खतरे वाले इलाकों के रूप में चिन्हित किया गया है।

यह आंकड़ा बताता है कि आपदा प्रबंधन एजेंसियों के सामने चुनौती कितनी बड़ी है। भूस्खलन की स्थिति में सड़कें बंद हो सकती हैं, गांवों का संपर्क टूट सकता है और राहत एवं बचाव कार्यों में गंभीर बाधा आ सकती है।

समय रहते तैयारी और अर्ली वार्निंग सिस्टम जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने की नीति पर्याप्त नहीं होगी। जरूरत है कि संभावित खतरे वाले क्षेत्रों की पहले से पहचान की जाए और स्थानीय लोगों को समय रहते चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की जाए।

भविष्य की तैयारी के लिए जरूरी कदम

  • ग्लेशियर झीलों की नियमित वैज्ञानिक निगरानी
  • सैटेलाइट आधारित खतरा मूल्यांकन
  • अर्ली वार्निंग सिस्टम की स्थापना
  • भूस्खलन संवेदनशील क्षेत्रों की विस्तृत मैपिंग
  • स्थानीय समुदायों को आपदा प्रशिक्षण
  • सुरक्षित निकासी मार्गों की पहले से योजना
  • पुलों और सड़कों की आपदा सहन क्षमता बढ़ाना
  • महत्वपूर्ण पनबिजली परियोजनाओं की सुरक्षा समीक्षा
हिमालय की चेतावनी को नजरअंदाज करना खतरनाक

नेपाल में हुई प्राकृतिक तबाही ने पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक गंभीर संदेश दिया है। जम्मू-कश्मीर में ग्लेशियरों के पिघलने, ग्लेशियर झीलों के विस्तार, भूस्खलन और भूकंपीय खतरों को देखते हुए अब वैज्ञानिक निगरानी और मजबूत आपदा तैयारी की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। उम्मीद यही है कि ऐसी विनाशकारी घटना कभी न हो, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि संभावित खतरे को नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते तैयारी करना ही सबसे प्रभावी उपाय है। सही नीति, आधुनिक तकनीक, अर्ली वार्निंग सिस्टम और स्थानीय स्तर पर तैयारी भविष्य में बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान को कम कर सकती है।

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