यूपी में 9 साल का ‘एनकाउंटर मॉडल’:

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यूपी में 9 साल का ‘एनकाउंटर मॉडल’: 17 हजार से ज्यादा मुठभेड़, 289 अपराधी ढेर | VARDat News
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यूपी में 9 साल का ‘एनकाउंटर मॉडल’: 17 हजार से ज्यादा मुठभेड़, 289 अपराधी ढेर

मार्च 2017 से अब तक उत्तर प्रदेश में पुलिस और अपराधियों के बीच हुई मुठभेड़ों के आंकड़े क्या कहते हैं? जानिए जोनवार कार्रवाई, पुलिस को हुए नुकसान और इलाहाबाद हाईकोर्ट की गंभीर चिंता की पूरी कहानी।

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में मार्च 2017 से अपराध और संगठित अपराध के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई लगातार चर्चा के केंद्र में रही है। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले करीब नौ वर्षों में प्रदेश में 17,043 पुलिस मुठभेड़ हुई हैं। इन कार्रवाइयों में 289 अपराधी मारे गए, जबकि 11,834 आरोपी घायल हुए और 34,253 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।

9 साल की कार्रवाई के बड़े आंकड़े

17,043 कुल पुलिस मुठभेड़
289 अपराधी मारे गए
11,834 आरोपी घायल
34,253 आरोपी गिरफ्तार
आंकड़ों का गणित देखें तो प्रदेश में इस अवधि के दौरान औसतन करीब पांच पुलिस मुठभेड़ प्रतिदिन दर्ज हुईं। सरकार इसे संगठित अपराध और गंभीर अपराधों के खिलाफ चलाए गए सबसे बड़े अभियानों में से एक बताती है।

मेरठ जोन सबसे आगे, वाराणसी और आगरा भी पीछे नहीं

सरकारी आंकड़ों में अलग-अलग पुलिस जोन और कमिश्नरेट की कार्रवाई में काफी अंतर दिखाई देता है। अपराधियों के मारे जाने और मुठभेड़ों की संख्या के मामले में मेरठ जोन सबसे आगे रहा।

पुलिस जोन मुठभेड़ मारे गए घायल आरोपी गिरफ्तार
मेरठ जोन 4,813 97 3,513 8,921
वाराणसी जोन 1,292 29 907 2,426
आगरा जोन 2,494 24 968 5,845

मेरठ जोन में कुल 4,813 मुठभेड़ दर्ज की गईं। इनमें 97 अपराधी मारे गए, 3,513 घायल हुए और 8,921 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।

इसके बाद वाराणसी जोन का स्थान आता है। यहां 1,292 मुठभेड़ों में 29 अपराधी मारे गए, जबकि 907 घायल और 2,426 गिरफ्तार किए गए।

आगरा जोन में 2,494 मुठभेड़ हुईं। यहां 24 अपराधी मारे गए, 968 घायल हुए और 5,845 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।

इसके अलावा बरेली, लखनऊ, गाजियाबाद कमिश्नरेट, कानपुर, प्रयागराज और गौतम बुद्ध नगर कमिश्नरेट में भी पुलिस और अपराधियों के बीच बड़ी संख्या में मुठभेड़ दर्ज की गई हैं।

सिर्फ अपराधी ही नहीं, पुलिस ने भी गंवाई जान

पुलिसकर्मियों की शहादत और चोटें

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में अपराधियों से मुठभेड़ के दौरान 18 पुलिसकर्मी शहीद हुए, जबकि 1,852 पुलिस अधिकारी और जवान घायल हुए।

18 पुलिसकर्मी शहीद
1,852 पुलिसकर्मी घायल
477 मेरठ में घायल
104 वाराणसी में घायल

मेरठ जोन में ही अपराधियों से लड़ते हुए 2 पुलिसकर्मी शहीद हुए और 477 घायल हुए। वाराणसी जोन में 104 और आगरा जोन में 62 पुलिसकर्मी घायल होने की जानकारी दी गई है।

यह आंकड़ा बताता है कि कानून-व्यवस्था की कार्रवाई में पुलिसकर्मियों को भी गंभीर जोखिम उठाना पड़ा है। हालांकि, ऐसे अभियानों की सफलता का मूल्यांकन केवल मारे गए या गिरफ्तार अपराधियों की संख्या से नहीं, बल्कि अपराध नियंत्रण, दोषसिद्धि और कानून के पालन जैसे व्यापक मानकों से भी किया जाना जरूरी है।

सरकार का दावा: राष्ट्रीय औसत से कम अपराध दर

योगी सरकार के कार्यकाल में पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि प्रदेश में अपराध पर प्रभावी नियंत्रण हुआ है। दिए गए आंकड़ों के अनुसार, यूपी में संज्ञेय अपराध की दर राष्ट्रीय औसत से करीब 28.5 प्रतिशत कम रही।

252.3 राष्ट्रीय औसत — प्रति लाख आबादी पर संज्ञेय अपराध
180.2 उत्तर प्रदेश — प्रति लाख आबादी पर संज्ञेय अपराध

आंकड़ों के मुताबिक देश में प्रति एक लाख आबादी पर औसतन 252.3 संज्ञेय अपराध दर्ज हुए, जबकि उत्तर प्रदेश में यह दर 180.2 बताई गई है। राज्य में दर्ज कुल 4,30,552 संज्ञेय मामलों में से 2,21,615 मामले IPC और 2,08,937 मामले BNS के तहत दर्ज बताए गए हैं।

जरूरी बात: अपराध के आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि अपराध दर, FIR दर्ज होने की प्रवृत्ति, पुलिसिंग व्यवस्था और रिपोर्टिंग जैसे कई कारक आंकड़ों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए केवल एनकाउंटर की संख्या और अपराध दर के आधार पर कानून-व्यवस्था की पूरी तस्वीर तय करना उचित नहीं होगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

⚖ न्यायपालिका की चिंता भी महत्वपूर्ण

पुलिस एनकाउंटर मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण दूसरा पहलू न्यायपालिका की चिंता है। 31 जनवरी 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा आरोपियों के पैर में गोली मारने की कथित बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर टिप्पणी की थी।

पुलिस कानून से ऊपर नहीं है और किसी व्यक्ति को सजा देने का अधिकार न्यायपालिका का है।

मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पुलिस कार्रवाई में कानून और स्थापित प्रक्रिया के पालन पर जोर दिया। अदालत ने इस तरह की कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट के PUCL दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया।

रिपोर्टों के मुताबिक अदालत ने पुलिस कार्रवाई में नियमों के पालन को लेकर राज्य के डीजीपी और गृह सचिव से जवाब मांगा तथा पुलिस अधिकारियों के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए। अदालत की चिंता का मूल सवाल यही है कि अपराध के खिलाफ कठोर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन वह कानून और स्थापित प्रक्रिया के दायरे में होनी चाहिए।

2026 में भी जारी है अभियान

मार्च 2017 से

उत्तर प्रदेश में अपराध और संगठित अपराध के खिलाफ पुलिस की आक्रामक कार्रवाई का दौर जारी रहा।

करीब 9 वर्षों में

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 17,043 पुलिस मुठभेड़ दर्ज की गईं।

2026 के शुरुआती पांच महीने

सरकार के मुताबिक पुलिस मुठभेड़ों में 23 अपराधी मारे जा चुके हैं।

सरकार के मुताबिक वर्ष 2026 के शुरुआती पांच महीनों में ही पुलिस मुठभेड़ों में 23 अपराधी मारे जा चुके हैं। इससे संकेत मिलता है कि एनकाउंटर आधारित पुलिसिंग अभी भी राज्य की कानून-व्यवस्था रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।

लेकिन आने वाले समय में इस मॉडल की असली परीक्षा सिर्फ आंकड़ों से नहीं होगी। सवाल यह भी रहेगा कि मुठभेड़ों में हर कार्रवाई कितनी पारदर्शी थी, जांच कितनी निष्पक्ष हुई, अदालतों में मामलों का परिणाम क्या रहा और आम नागरिकों में कानून के प्रति विश्वास कितना मजबूत हुआ।

उत्तर प्रदेश में पिछले नौ वर्षों की पुलिस कार्रवाई निश्चित रूप से बड़े पैमाने की रही है। 17,043 मुठभेड़, 289 अपराधियों की मौत, 11,834 घायल और 34,253 गिरफ्तारियां इस अभियान के विशाल आकार को दिखाती हैं।

सरकार इसे अपराध के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई मानती है, जबकि न्यायपालिका ने यह स्पष्ट किया है कि अपराध नियंत्रण के साथ कानून का शासन और उचित प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

इसलिए यूपी के एनकाउंटर मॉडल की पूरी कहानी दो पहलुओं में देखनी होगी—एक तरफ अपराधियों के खिलाफ कठोर पुलिस कार्रवाई और दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करना कि हर कार्रवाई संविधान, कानून और न्यायिक दिशानिर्देशों के अनुरूप हो।

आखिरकार मजबूत कानून-व्यवस्था वही मानी जाएगी, जिसमें अपराधी कानून से डरें और आम नागरिक को भी कानून पर पूरा भरोसा रहे।

नोट: इस लेख में प्रस्तुत पुलिस एनकाउंटर, गिरफ्तारी, घायल पुलिसकर्मियों और अपराध दर से संबंधित आंकड़े उपलब्ध कराई गई सरकारी आंकड़ा-सूचना पर आधारित हैं। न्यायिक टिप्पणियों का उल्लेख उपलब्ध विवरण के आधार पर किया गया है। प्रकाशित करने से पहले नवीनतम आधिकारिक रिकॉर्ड और न्यायालय के आदेश से तथ्यों का सत्यापन करना उचित रहेगा।
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